लौट जाता है कोई बाहरस

चीख़ उठता है कोई अंदर से

सारे दरियाओं को डकार गया
यही उम्मीद थी समुंदर से

चोर आएगा, क्या ले जाएगा?
एक फ़ोटो मिलेगी लोकर से

सारे इक्के खड़े हैं शर्मिंदा
बाज़ी जीती गई है जोकर से

शाहज़ादा फ़िदा नचनिया पर
शाहज़ादी की शादी नौकर से

ज़ेहन उड़ता है आसमानों में
जिस्म लिपटा हुआ है बिस्तर से

मिसरा छाती को चीर देता है
शे'र जाता है सर के ऊपर से

ऊला लेटा हुआ है धरती पर
सानी जा कर लगेगा अंबर से

इश्क़ करलूँ मैं आपसे, या'नी
आइना दिल लगा ले पत्थर से?

मुझ को ग़ुस्सा ज़रा सा क्या आया
ख़ून बहने लगा पलस्तर से

लेनदार आ गए हैं अंदर तक
पैर बाहर गए थे चादर से

या जलादो इसे या दफ़नादो
बास आने लगी है फ़्रीज़र से

— Ashwani Mittal 'Aish'

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