Azhar
Ghazal

जुदास मुख़्तलिफ जो रंग सारे हैं हमारे हैं

मगर इस शख़्सियत के सच में कितने ही ख़सारे हैं

दिलों की खुशगवारी कब हमें यूँ रास आई है
हमें क्या मौसमों की फिक्र पतझड़ हैं बहारें हैं

हमारी रहनुमाई भी हमारे सर ही आनी थी
फ़क़त अक्स-ए-नज़र हैं ये मेरे जो भी सहारे हैं

बहुत कुछ और कहती थी उदासी इन दरारों की
मकानें तो बनाएं हम ने रिश्ते कितने मारे हैं

हमें ऐ ज़िन्दगी ऐसे हुजूम-ए-ग़म से मत मिलवा
तरस खा थोड़ा हम पर अपनी माँ के हम दुलारे हैं

नहीं अब तितलियाँ आती मिरे गुलशन कि चौखट पर
बता ये अहल-ए-गुलशन कैसी आफ़त के इशारे हैं

— Azhar

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