जुदास मुख़्तलिफ जो रंग सारे हैं हमारे हैं
मगर इस शख़्सियत के सच में कितने ही ख़सारे हैं
दिलों की खुशगवारी कब हमें यूँ रास आई है
हमें क्या मौसमों की फिक्र पतझड़ हैं बहारें हैं
हमारी रहनुमाई भी हमारे सर ही आनी थी
फ़क़त अक्स-ए-नज़र हैं ये मेरे जो भी सहारे हैं
बहुत कुछ और कहती थी उदासी इन दरारों की
मकानें तो बनाएं हम ने रिश्ते कितने मारे हैं
हमें ऐ ज़िन्दगी ऐसे हुजूम-ए-ग़म से मत मिलवा
तरस खा थोड़ा हम पर अपनी माँ के हम दुलारे हैं
नहीं अब तितलियाँ आती मिरे गुलशन कि चौखट पर
बता ये अहल-ए-गुलशन कैसी आफ़त के इशारे हैं
— Azhar















