"ज़िंदगी का सफ़र"

ज़िंदगी की सड़क पर
एक सफ़र पर चला मैं
पैदा होते ही
बचपन कब छूट गया
कुछ पता नहीं चला

जैसे जैसे उम्र बढ़ी
सड़क भी बड़ी होती गई
और बढ़ती गई हमारे तुम्हारे
चलने को रफ़्तार भी
तेज़ रफ़्तार के चक्कर में
कुछ इतना तेज़ चलता गया मैं
कि कितने रिश्तों को छोड़ा
नातों को छोड़ा
अपनों को खोया
ना ही लम्हों को पिरोया
दिल के क़रीब थी उन सारी
अनगिनत बातों को छोड़ा
ख़ूब-सूरत रातों को छोड़ा
ख़ास मुलाक़ातों को भी
बेवकूफों की तरह छोड़ आया मैं

अब सड़क के उस मोड़ पर हूँ
जहाँ एक बोर्ड लगा हुआ है
दो निशान हैं जिस पर
एक दाहिने तरफ़ जाने का
और दूसरा बाएँ तरफ़
दाहिने तरफ़ का रास्ता
जाता है फ़िरदौस की तरफ़
और बाएँ तरफ़ का रास्ता
दोजख़ की तरफ़
और आगे सिर्फ़ खाई है
लगता है
उम्र से भी लंबे सफ़र में था मैं
क्योंकि शायद बस भाग ही रहा था मैं
सफ़र के अंत में आ कर
अब ये तय करना मुश्किल है
कि जाऊँ किधर
दुनिया ने सिखाया था फ़िरदौस ख़ूब-सूरत है
बस दाहिने तरफ़ मुड़ गया मैं
और सत्यानाश देखिए
कोई बोर्ड उल्टा लगा गया था
एक सेकंड को लगा कि काश दुनिया ने
ग़लत सिखाया होता
तो ग़लती से ही मगर
सही जगह पहुँचते मैं
सोचता हूँ अब कि
उस बोर्ड को देख कर
काश मैं पलट गया होता

— Saurabh Yadav Kaalikhh

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