KARAN
KARAN
Ghazal

फूल बिखरा तो न ये सोच किधर जाएगा

बनके ख़ुशबू-सा फ़िज़ाओं में बिखर जाएगा

वक़्त हर ज़ख़्म का मरहम नहीं होता पागल
रहते-रहते यूँ जुदा रब्त भी मर जाएगा

जान ले लेगा यक़ीनन ग़म-ए-जानाँ मेरी
कुछ घड़ी और अगर दिल में ठहर जाएगा

हम-सफ़र बा'द तेरे कुछ नहीं बदलेगा मगर
हाँ तेरे साथ मेरा शौक़-ए-सफ़र जाएगा

जा-ब-जा सर न झुका होश में आ बात समझ
बे-तरह दोस्त दु'आओं से असर जाएगा

ग़ैर-मुमकिन है तेरे बा'द कहीं दिल न लगे
सोच ले जाने से पहले तू अगर जाएगा

इक मुसाफ़िर से नहीं ठीक लगाना दिल का
जाने किस राह मुसाफ़िर ये गुज़र जाएगा

इस मुहब्बत ने मुझे दी हैं ख़राशें इतनी
आईना देख के सूरत मेरी डर जाएगा

ढूँढ़ने लगते हैं दीवार-ओ-दर-ओ-बाम तुझे
ऐ करन शाम ढले आज तो घर जाएगा

— KARAN

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