जो हैं प्यार के दुश्मन उन पर ख़ाक पड़े
ख़ाक पड़े और बद से बदतर ख़ाक पड़े
पिछली बातें दोहरा कर अब क्या करना
छोड़ो उन को उन बातों पर ख़ाक पड़े
मेरे क़त्ल के मुजरिम को आज़ाद किया
वाह रे मुंसिफ तेरे ऊपर ख़ाक पड़े
जंग से पहले हँसते बच्चे देख तो लो
क्या चाहते हो इन चेहरों पर ख़ाक पड़े
शर्म नहीं उस बेग़ैरत की आँखों में
चाहे जितनी उस के ऊपर ख़ाक पड़े
— Monis faraz















