"कब"

कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से
कब ये कलियाँ फूटेंगी
और ये फूल हसेंगे
कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे
कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी
कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी
कब जंगल साँसे लेंगे
कब सब जाएँगे अपने घर
कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी
कब हम ऐसों को पूछेगा कोई
और ये फ़क़ीरों को भी
क़िस्से में लाया जाएगा
कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी
और मिट्टी सोने के भाव में आएगी
कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी
कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी
कब अंबर से परियाँ उतरेंगी
कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी
कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे
बरखा गीत बनाएगी
और मोर उठा के पर
कत्थक करते देखे जाएँगे
नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे
मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी
कब कोयल की कूक सुनाई देगी
कब भॅंवरे फिर
गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में
और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी
फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में
कब ये दुनिया रौशन होगी
कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे
कब ये सब मुमकिन है
कब सबके ही सपने पूरे होंगे
कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ
कब ये बहारें लोटेंगी
कब वो तारीख़ आएगी
बस मुझ को ही नहीं
सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का

— BR SUDHAKAR

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