कुछ इस ख़ातिर भी सपना तुम को पाने का नहीं
मैं कंगन पहना सकता हूँ 'प सोने का नहीं
उसे ये बात पूछो ला-मकानी होती क्या
वो कतरा अश्क का जो तेरे शाने का नहीं
चलो तुम कहती हो तो मान लेता हूँ बहन
वगरना जानता हूँ, घाव गहने का नहीं
हमारी मंज़िलों का लिख रहे हैं हम जहाँ
वहीं इक तजरबा भी है जो लिखने का नहीं
— Aarush Sarkaar















