“आदत”
कभी जब सोचता हूँ क्या करूँगा बिन तिरे
मुझे अफ़्सुर्दगी महसूस होती है बहुत
कि तुझ से पेश्तर तो बस सियह थी ज़िंदगी
तिरी आमद ने मानो रंग इस में भर दिए
कि अब हर बात को जज़्बात को हालात को
मिरी हर फ़िक्र को हर दर्द को हर रंज को
मिरी इस बे-बसी या बे-कली या तैश को
मिरे हर ग़म को और उन से मिली हर आह को
मिरे हर ज़ख़्म और उन से मिले हर दाग़ को
मिरी इस ज़िंदगी में पड़ रही उफ़ताद को
समझने के लिए तू है मुयस्सर आज तो
मगर कल का नहीं मालूम मुझ को क्या करूँ
अगर तू कल नहीं होगा ख़ुदा-ना-ख़्वास्ता
ये सब फिर कौन समझेगा मुझे बतला ज़रा
ख़याल आता है ये जब भी मुझे तो यूँ लगे
कि गोया चीर ही देगा ये अब सीना मिरा
भला कैसे जि
यूँगा बिन तिरे ये ज़िंदगी
तू वो आदत है जो मैं छोड़ सकता ही नहीं















