"कमरा"

जिस कमरे को सब मालुम था वो कमरा भी छोड़ दिया

जिस ने आँख बसंती देखी जिस ने देखी पुरवाई
जिस के आगे आँसू टपके जिस के आगे बदली छाई
जिस के अंदर चिड़िया चहकी जिस
में तितली मुस्काई
हँस हँस कर खोली थी जिस
में मैं ने अपनी तन्हाई

उस कमरे को छोड़ा पहले फिर हँसना भी छोड़ दिया
जिस कमरे को सब मालुम था वो कमरा भी छोड़ दिया

हम दोनों को चुपके चुपके रोने की बीमारी थी
बच्चों जैसी चालाकी थी बच्चों सी हुश्यारी थी
हम दोनों मर सकते थे पर जीने की लाचारी थी
हम दोनों ने छत की रस्सी रातों रात निहारी थी

हमनें जीना छोड़ा पहले फिर मरना भी छोड़ दिया
जिस कमरे को सब मालुम था वो कमरा भी छोड़ दिया

— Abhishar Geeta Shukla

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