हराम कह के मज़े को ख़राब करते हैंये पारसा मिरा पीना अज़ाब करते हैंतुझे ख़बर नहीं ख़लवत में तुझ को सोच के हमकि रोज़ क्या अमल-ए-ना-सवाब करते हैं— Faiz Ahmad