"अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है"
गुज़रती उम्र ढ़लती जा रही है
ज़मीं पाँव निगलती जा रही है
अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है
परी आगे निकलती जा रही है
सितारे बारी-बारी बुझ रहे हैं
हवा मोअत्तर होती जा रही है
चमकती जा रही है कोई मछली
समुंदर बर्फ़ करती जा रही है
मैं अपनी नाव में बेकस पड़ा हूँ
उफकती नब्ज़ डूबी जा रही है
अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है
अँधेरा ही समुंदर का ख़ुदा है
ख़ुदा मछली पकड़ना चाहता है
— Ammar Iqbal















