0

गुज़र जाते हैं जो नज़रें बचा कर बे-ख़बर हो कर  - Dharmpal Aaqil

गुज़र जाते हैं जो नज़रें बचा कर बे-ख़बर हो कर
वो क्या दरमाँ करेंगे दर्द-ए-दिल का चारागर हो कर

नहीं सय्याद का शिकवा यही मंज़ूर-ए-क़ुदरत था
क़फ़स ही में हमें रहना था यूँ बे-बाल-ओ-पर हो कर

ज़माने-भर में हो आए तुम्हारी दीद की ख़ातिर
चराग़-ए-आरज़ू बन कर तमन्ना-ए-नज़र हो कर

बुरा हो बे-ख़ुदी का हम रहे महरूम-ए-नज़्ज़ारा
गुज़रने को हज़ारों बार वो गुज़रे इधर हो कर

मुक़द्दर में जो होता है लिखा हो कर ही रहता है
मिरी आहें पलट आईं फ़लक से बे-असर हो कर

कहाँ से किस तरह किस वक़्त खिंच कर लोग आ पहुँचे
वहीं लगते गए मेले कोई गुज़रा जिधर हो कर

सुख़न-दानों ने लाखों शे'र कह डाले मगर 'आक़िल'
नहीं वो शे'र जो उतरे न दिल में नेश्तर हो कर

Dharmpal Aaqil
0

Share this on social media

Miscellaneous Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Dharmpal Aaqil

As you were reading Shayari by Dharmpal Aaqil

Similar Writers

our suggestion based on Dharmpal Aaqil

Similar Moods

As you were reading Miscellaneous Shayari