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मंज़ूर कुछ नहीं है तुम्हारे सिवा मुझे  - Dharmpal Aaqil

मंज़ूर कुछ नहीं है तुम्हारे सिवा मुझे
तुम मिल गए तो गोया ख़ुदा मिल गया मुझे

पहले सा वो ख़ुलूस मिलेगा कहाँ मगर
फिर भी है दोस्तों का बहुत आसरा मुझे

क्या बोल थे दिलों में जो रस घोलते रहे
भूलेगी अब कहाँ वो छनकती सदा मुझे

'आक़िल' गुनाह करते हुए सोचता है कौन
हर इक को है गिला कि मिली क्यों सज़ा मुझे

Dharmpal Aaqil
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