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अब तिरे ग़म के अँधेरों में उतर जाऊँगा  - Dilnawaz Khan Dilnawaz

अब तिरे ग़म के अँधेरों में उतर जाऊँगा
ख़ुद ही बन के मैं वहाँ शम्स-ओ-क़मर जाऊँगा

इक नज़र प्यार से देखो तो नवाज़िश होगी
फिर न आउँगा कभी ऐसे नगर जाऊँगा

फिर से बे-साख़्ता हिचकी जो मुझे आएगी
नाम तेरा ही सदा लूँगा जिधर जाऊँगा

मिल गई तेरे ख़यालों से तजल्ली दिल को
तल्ख़ राहों पे भी बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर जाऊँगा

हर डगर टेढ़ी है तिरछी है ज़माना बे-दिल
ज़िद है मुझ को कि तुझे ढूँड के घर जाऊँगा

मेरी हस्ती नहीं अख़बार कि हर कोई पढ़े
मैं रिसाला हूँ सर-ए-अहल-ए-नज़र जाऊँगा

'दिल-नवाज़' आज तलक क्यों मुझे मंज़िल न मिली
क्या यूँ ही उम्र की राहों से गुज़र जाऊँगा

Dilnawaz Khan Dilnawaz
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