हिज्र कुछ इस तरह गुज़ारा है
वस्ल कह कर उसे पुकारा है
एक तन्हाई थी मिरी अपनी
इस पे भी उस का ही इजारा है
उम्र इतनी अभी हुई तो नहीं
जितना मैं ने उसे गुज़ारा है
फ़ैसला हो नहीं सका अब तक
कौन से ग़म ने मुझ को मारा है
ज़िंदगी फिर भी मेरे जैसी रही
मैं ने तो इस को ही सँवारा है
मेरी जानिब है आप की उँगली
पर किसी और का इशारा है
— Ejaz Haidar















