Gulzar
Gulzar
Nazm

क्या लिए जाते हो तुम कंधों पे यारो

इस जनाज़े में तो कोई भी नहीं है,
दर्द है कोई, न हसरत है, न ग़म है
मुस्कुराहट की अलामत है न कोई आह का नुक़्ता
और निगाहों की कोई तहरीर न आवाज़ का कतरा
क़ब्र में क्या दफ़्न करने जा रहे हो?

सिर्फ़ मिट्टी है ये मिट्टी-
मिट्टी को मिट्टी में दफ़नाते हुए
रोेते हो क्यूँ ?

— Gulzar

More by Gulzar

Other nazm from the same pen

See all from Gulzar →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling