"महबूब को मशवरा"

दिन महीने साल गुज़रे तुम अभी बिसरी नहीं हो
लोग फिर क्यूँ कह रहे हैं तुम के अब मेरी नहीं हो
लोग पागल हैं बेचारे जानते ये कुछ नहीं हैं
कह चुका हूँ तुम हो मेरी मानते ये कुछ नहीं हैं
तुम इन्हें आ कर कहो ना कुछ अभी बदला नहीं हैं
मैं फ़क़त नाराज़ हूँ मैं ने अभी छोड़ा नहीं है
तुम नहीं आई तो फिर ये प्रश्न के अंबार देंगे
पूछ कर के ये तुझे मुझ से मुझी को मार देंगे
फिर तुम्हारे पास रोने का सबब तुम को मिलेगा
सोचना फिर क्या कभी वो प्यार अब तुम को मिलेगा
सोच कर के फिर मुझे इक दिन बहुत पछताओगी तुम
फिर अकेले इक कदम चलने से भी घबराओगी तुम
क्या पता पाजेब की आवाज से झुँझला उठो तुम
हाथ के कंगन की खनखन सुन कहीं पगला उठो तुम
इस लिए मैं इक दफा फिर से तुम्हें समझा रहा हूँ
बात मानो लौट आओ मैं तुम्हें बतला रहा हूँ
मैं अभी भी कह रहा हूँ कुछ अभी बिगड़ा नहीं है
प्यार से बढ़कर हमारे बीच का झगड़ा नहीं है

— Aditya Kaushal

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