नज़र में शाएर के फिर रहा है, हरा-भरा पुर-बहार जंगल

वो सुब्ह-ए-रंगीं, वो कैफ़-ए-मंज़र, वो दामन-ए-कोह बिंधिया-चल
मिली थी इक रंग-ओ-बू की दुनिया, तमाम सहरा चमन चमन था
मगर वो जन्नत-निगाह वादी बहार का मुस्तक़िल वतन था
खड़ा हुआ था ग़रीब शाएर, ख़मोश सहरा-ए-रंग-ओ-बू में
मचल रही थी सहर की दोशीज़ा शब के आग़ोश-ए-आरज़ू में
हों चश्म-ए-आशिक़ में जैसे आँसू, सितारे यूँ झिलमिला रहे थे
फ़लक पे बरहम थी बज़्म-ए-अंजुम, चराग़ गुल होते जा रहे थे
तजल्लियों की फ़लक से बारिश थी, ज़ुल्मत-ए-शब बिखर रही थी
कि सुब्ह की साँवली हसीना नहा रही थी, निखर रही थी
नदी में हल्का सा था तमव्वुज कहें जिसे बे-क़रार ग़फ़लत
कि नींद में जैसे करवटें ले, जवान, बद-मस्त-ए-ख़्वाब औरत
हवा जो शाना हिला रही थी, तो मौजें हुशियार हो रही थीं
तुयूर के मस्त ज़मज़मों से फ़ज़ाएँ बेदार हो रही थीं

ये कैफ़ियत थी और एक जोगन सितार बैठी बजा रही थी
मगर वो जंगल की शाहज़ादी बहार के गीत गा रही थी
बहार के गीत गा रही थी फ़ज़ा में नग़्में बिखेरती थी
सुकूत फ़ितरत का दाद देता था रुख़ जिधर को वो फेरती थी
वो नींद से मुज़्महिल निगाहें वो लब पे मग़्मूम मुस्कुराहट
हज़ार अंदाज़-ए-दिल-रुबाई और एक मासूम मुस्कुराहट
थीं नींद से रस्मसाई आँखें और इन में शोख़ी मचल रही थी
ख़ुमार-आलूदा अँखड़ियों में बहार की रूह पल रही थी
क़मर की तलअत, शफ़क़ की सुर्ख़ी, जबीं पे सुब्ह-ए-बहार ख़ंदाँ
निगाह आईना-दार-ए-मंज़र, जमाल पर्वर्दा-ए-बयाबाँ
सितार पे नाज़ुक उँगलियाँ थीं, कलाई गोरी लचक रही थी
उमंगें लेती थीं दिल में करवट, रग-ए-जवानी फड़क रही थी

सुनहरे जल्वों की छूट डाली जो शाह-ख़ावर के ताज-ए-ज़र ने
तलाई अफ़्शाँ चुनी जबीं पर मलीह दोशीज़ा-ए-सहर ने
तलाई ज़ेवर से और चमकी उरूस-ए-मंज़र की दिलरुबाई
उठा जो सूरज तो धूप निकली हसीना-ए-सुब्ह खिलखिलाई
फ़ज़ा की तब्दीलियों को देखा जो बज़्म-ए-फितरत की मुतरिबा ने
सितार रक्खा, उठाई गगरी, नदी किनारे चली नहाने
वो जा रही थी नदी की जानिब मैं लौट कर घर को आ रहा था
सितार ख़ामोश हो चुका था मगर ये दिल गुनगुना रहा था
ज़माना गुज़रा नुक़ूश-ए-माज़ी ख़याल से मिटते जा रहे हैं
मगर वो नग़्में 'जमील' अब तक दिमाग़ को गुदगुदा रहे हैं

— Jameel Mazhari

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