ऐ दश्त-ए-शब-गुज़ार तिरी आस का हिरन
खाई में यास की जो गिरा रो पड़ी पवन
जा कर दयार-ए-मर्ग में छोड़ आइए उसे
जो घूमता है ओढ़े हुए दर्द का कफ़न
अब तुझ से ही जलाऊँगा ये गुल-शुदा चराग़
ऐ टिमटिमाती रात ढले चाँद की किरन
अब तेरे ख़त को ढूँड रहा हूँ वरक़ वरक़
उक्ता चुका है हर्फ़-ओ-हिकायत से मेरा मन
आवाज़ आ रही है फ़सील-ए-नजात से
तेरी कमी खटकती है ऐ मेरे हम-वतन
यज़्दाँ ख़ता मुआ'फ़ गिरा जा रहा हूँ मैं
फिर आदमी के भेस में आया है अहरमन
— M Kothiyavi Rahi















