"थोड़ी छोटी थोड़ी बड़ी बच्ची"

आज एक बच्ची
थोड़ी सी छोटी थोड़ी बड़ी बच्ची
मुझ से दूर हो गई है
उसे जाना था इलाहाबाद चली गई है
बच्ची क्या वो पूरी नानी है
मुझे काका चाचा या अंकल नहीं कहती
बुलाती है मुझे
तेज आवाज़ में
सीधे मेरे नाम से
अनंत नहीं ग़लत बात
अनंत वाक करने चलो
अनंत नहीं गिर जाऊँगी
अनंत गाड़ी चलाऊँगी
अनंत हनुमान चालिसा है
अनंत मंकी कैसे करता है
खों
वो बच्ची
थोड़ी सी छोटी थोड़ी बड़ी बच्ची
अपने छोटे-छोटे हाथों से
बनाती है रोटियाँ
कच्ची रोटियाँ
पका नहीं सकती वो उन रोटियों को आँच में
न उस के पास आँच है न बड़े लोगों का सा दिल
वो दिल जो जलता रहता है
उस के दिल में तो बस मिठास है
हँसी है उल्लास है
इन सब के बा'द भी क्या रोटी का पकना ज़रूरी है
नहीं नहीं बिल्कुल नहीं
बिल्कुल भी नहीं
मेरी बच्ची
थोड़ी सी छोटी थोड़ी बड़ी बच्ची

जब वो बिगड़ती है
तो किसी से नहीं बहलती
मगर जब भी उस को लगता है कि
कोई नाराज़ है घर में
कहीं कोई बात है घर में
वो फ़ौरन बदल देती है हवा का रुख़
अपनी मखमली बातों से
वो भोली भाली बातें लूट लेती हैं
सबके ग़मों को
महफिलों को
उस की मासूम हँसी
बाबा का दर्द मिटा देती है
ग़म अफ़कार भुला देती है
कितनी प्यारी है वो
थोड़ी सी छोटी थोड़ी बड़ी बच्ची
नज़्म के पूरे होते ही शायद
बच्ची पहुँच जाएगी
मगर यक़ीं है मुझ को
उस की मुसलसल याद आएगी

— Muntazir Firozabadi

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