दर्द-ए-दिल दीजिये या दवा दीजिए
बस ज़रा सा सनम मुस्कुरा दीजिए
लूट ले जाएगा कोई रहज़न सनम
आप दिल को हमीं में छुपा दीजिए
आख़िरी साँस भी ले गया डाकिया
पढ़ उसे भी ख़ुशी से जला दीजिए
लग रहा थक गया वक़्त भी घूमकर
पाँव उस के दबा कर सुला दीजिए
शोर है भीड़ है यूँ जनाज़े के दिन
'सारथी' इक ग़ज़ल तो सुना दीजिए
— Saarthi Baidyanath















