हवा का एक झोंका ऐसे गुज़रा
कि अपने साथ
उस सूनी सड़क पर
पड़े बेजान
पीले हो चुके
उन आम के
इमली के
गुलमोहर के पत्तों को
जिन्हें हम रोज़ अपने पाँव से
बाइक के टायर से
कुचलते देते थे
और इग्नोर कर के आगे
बढ़ जाते थे..
अपने साथ सड़कों के
किनारों पर बने उन
छोटे सूखे नालों में सरका के फेंक आया
ये पत्ते याद दिलवाते हैं उन बीते पलों की
कि जब हम
अपनी धुन में
कान में वो लीड ठूँसे
अपनी मस्ती से गुज़रते थे
किसी जाती हुई स्कूटी पर
शहरीली परी को उस के
शानों से लटकते
बेहया आँचल को
बेहद ध्यान से
तकते हुए और पास आ कर
बोल कर
कि
"देखिए ये ख़ुश-नसीब आँचल कहीं ग़लती से टायर में न फँस जाए"
ओवर टेक करते थे
ज़रा सा तेज़ चल कर और
आगे बाईं जानिब
वो चचा जो 10 की सिगरेट
हम को अक्सर 9 में देते थे
और उन की ये मुहब्बत पाँव की ज़ंजीर होती थी
जो हम को रोक देती थी
इन्हें इग्नोर करने से
कि ऑफ़िस लेट पहुँचो..
डोंट केयर
मगर याँ
एक कश तो खींच ही लो
क़सम से लॉकडाउन क्या हुआ है
ये सब कुछ एक पुरानी फ़िल्म का
एक सीन सा मालूम होता है
कि जिस में हीरो ग़लती से
बहुत पीछे चला आया
जहाँ पर दूर तक
इंसान क्या हैवान भी
ढूँढ़े नहीं मिलते
दुआ करता हूँ
हम सब इस बला से
जीत जाएँ
हमारे पाँव चलती ज़िन्दगी के ब्रेक से हट कर
दुबारा एक्सेलेटर को दबाएँ !!















