ग़म मुसलसल है राब्ता कम है

हाए तब्दीलियों का मौसम है

चाक दामन है इश्क़ में मेरा
हाल मजनू से क़ैस से कम है

बस के दीदार की तमनना है
आँख इस शौक़ में मेरी नम है

न कहूँ कुछ अगर तो है अच्छा
बात जितनी भी मैं करुँ कम है

कैसे भर दे वो ज़ख़्म उल्फ़त के
चारा-गर भी तो इबने आदम है

शब -ए- हिजरां का हो पहर जैसे
ज़ुल्फ़ वल्लेल में जो ये ख़म है

तुझ से मन्सूब हैं बहारें सब
और जो तू नहीं तो मातम है

वो अता कीं हैं नेमतें या रब
उम्र भर सजदे में रहूँ कम है

— Shadan Ahsan Marehrvi

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