नई मंज़िलें हैं नया रास्ता हैमुक़द्दर की मेरे ख़ुदा जानता हैमैं खोया हुआ रहता हूँ अपनी धुन मेंमेरा अब किसी से कहाँ वास्ता है— ABhishek Parashar