ho gayi zaaya daleelen phir sabhi | हो गयी ज़ाया दलीलें फिर सभी

  - Vikram Sharma

हो गयी ज़ाया दलीलें फिर सभी
फिर से उसने कह दिया तेरी क़सम

  - Vikram Sharma

Shama Shayari

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    तेरी हर बात मोहब्बत में गवारा कर के
    दिल के बाज़ार में बैठे हैं ख़सारा कर के

    आसमानों की तरफ़ फेंक दिया है मैं ने
    चंद मिट्टी के चराग़ों को सितारा कर के
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    Rahat Indori
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    तन्हाई के हुजूम में वो एक तेरी याद
    जैसे अँधेरी रात में जलता हुआ दिया
    Sagheer Lucky
    बिठा दिया है सिपाही के दिल में डर उसने
    तलाशी दी है दुपट्टा उतार कर उसने

    मैं इसलिए भी उसे ख़ुदकुशी से रोकता हूँ
    लिखा हुआ है मेरा नाम जिस्म पर उसने
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    Zia Mazkoor
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    बीस बरस से इक तारे पर मन की जोत जगाता हूँ
    दीवाली की रात को तू भी कोई दिया जलाया कर
    Majid Ul Baqri
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    तिरे बग़ैर अजब बज़्म-ए-दिल का आलम है
    चराग़ सैंकड़ों जलते हैं रौशनी कम है
    Shakeel Badayuni
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    दिलों को तेरे तबस्सुम की याद यूँ आई
    कि जगमगा उठें जिस तरह मंदिरों में चराग़
    Firaq Gorakhpuri
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    ये शुक्र है कि मिरे पास तेरा ग़म तो रहा
    वगर्ना ज़िंदगी भर को रुला दिया होता
    Gulzar
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    जो ज़हर पी चुका हूँ तुम्हीं ने मुझे दिया
    अब तुम तो ज़िन्दगी की दुआएँ मुझे न दो
    Ahmad Faraz
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    बिछड़ जाएँगे हम दोनों ज़मीं पर
    ये उस ने आसमाँ पर लिख दिया है
    Siraj Faisal Khan
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    हस्ती का नज़ारा क्या कहिए मरता है कोई जीता है कोई
    जैसे कि दिवाली हो कि दिया जलता जाए बुझता जाए
    Nushur Wahidi
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    ये कैसे सानिहे अब पेश आने लग गए हैं
    तेरे आगोश में हम छटपटाने लग गए हैं

    बहुत मुमकिन है कोई तीर हमको आ लगेगा
    हम ऐसे लोग जो पँछी उड़ाने लग गए हैं
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    Vikram Sharma
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    ग़म-ज़दा दिल पे लतीफ़े भी नहीं खुलते हैं
    तेज़ तूफ़ान में छाते भी नहीं खुलते हैं

    दिल की जानिब से भी आवाज़ नहीं आती है
    हम पे दुनिया के इशारे भी नहीं खुलते हैं

    इश्क़ में वापसी आसान नहीं होती है
    यहाँ से आगे के रस्ते भी नहीं खुलते हैं
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    Vikram Sharma
    मशवरा है ये बेहतरी के लिए
    हम बिछड़ जाते हैं अभी के लिए

    प्यास ले जाती है नदी की तरफ़
    कोई जाता नहीं नदी के लिए

    ज़िंदगी की मैं कर रहा था क्लास
    बस रजिस्टर में हाज़िरी के लिए

    आप दीवार कह रहे हैं जिसे
    रास्ता है वो छिपकली के लिए

    क़ैस ने मेरी पैरवी की है
    दश्त-ओ-सहरा में नौकरी के लिए

    नील से पहले चाँद पर मौजूद
    एक बुढ़िया थी मुख़बिरी के लिए
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    Vikram Sharma
    एक ख़ामोशी ने सदा पायी
    ढाई हर्फ़ों में फिर वो हकलाई

    चार दीवार चन्द छिपकलियाँ
    हिज्र की रात के तमाशाई

    डूबने का उसे मलाल नहीं
    जिसने देखी नदी की रानाई

    आख़िरी ट्रैन थी तिरी जानिब
    जो ग़लत प्लेटफॉर्म पर आयी

    बारिशों ने हमें उदास किया
    सील दीवार में उतर आयी
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    Vikram Sharma
    कोई आग़ाज़ में अंजाम बता जाता है
    और फिर पूरी कहानी का मज़ा जाता है

    हम यही सोचते हैं रास्ते भर फूल लिए
    इक मुलाक़ात पे क्या तोहफ़ा दिया जाता है

    इश्क़ जिस से हो तेरी राह तकी जाती है
    हिज्र जिस से हो तुझे याद किया जाता है

    कितने ही रंज हैं शिकवे हैं मगर ये भी है
    जिस को जाना हो उसे जाने दिया जाता है

    हिज्र का हुस्न उदासी से बढ़ाता हूँ मैं
    अच्छा मिसरा हो तो फिर शे'र कहा जाता है

    मेरी तन्हाई में डाले है ख़लल छिपकलियाँ
    उस की तस्वीर पे फिर ध्यान चला जाता है
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    Vikram Sharma

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