"Jamaaliyaat" | "जमालियात"

  - Wamiq Jaunpuri

"जमालियात"


जमालियात का नक़्क़ाद जितना हैराँ है
वो बाब-ए-हुस्न में भी उतना ही परेशाँ है
जमालियात में क्या है जो ख़ुद नहीं फ़न में
जमालियात का महवर नशात-ए-दौराँ है
जमालियात को फ़रहंग में करो न तलाश
जमालियात में ज़ुल्फ़-ए-सुख़न की अफ़्शाँ है
जमालियात को उस्लूब में शुमार करो
जमालियात में हर फ़र्द इक दबिस्ताँ है
जमालियात तग़य्युर-पज़ीर हिस्सियत
जमालियात में सहरा भी इक गुलिस्ताँ है
जमालियात सक़ाफ़त का हफ़्त रंग लिबास
जो रंग ओ नस्ल की तफ़रीक़ से गुरेज़ाँ है
जमालियात बदलते हैं माह-ओ-साल के साथ
जमालियात में तारीख़-ए-फ़िक्र-ए-इंसाँ है
जमालियात हैं तख़्लीक़ फ़न का सर चश्मा
अदीब अदब के लिए ख़ुद जमाल सामाँ है
जमालियात में है हुस्न-ए-कार का जादू
जमालियात की तस्ख़ीर कार-ए-मर्दां है
कोई उसूल नहीं हुस्न के परखने का
कहीं ख़िज़ाँ है हसीं और कहीं बहाराँ है
जहाँ में जितने हैं फ़नकार उतनी तरह के हुस्न
तो क्या बंधे टिके मेयार-ए-नौ का इम्काँ है
बदलता रहता है मेयार-ए-हुस्न हुस्न के साथ
तो किस लिए कोई नक़्क़ाद-ए-फ़न परेशाँ है

  - Wamiq Jaunpuri

Kamar Shayari

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