Rekhta Pataulvi

Rekhta Pataulvi

@Shahzad

Rekhta Pataulvi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Rekhta Pataulvi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ख़ुदा ने मुहाफ़िज़ बनाया है इनको सताएँ न फ़ूलों को, ख़ारों से कह दो — Rekhta Pataulvi
एक आलम की नज़रें हैं मुझ पर और मेरे जाम में ज़रा सी है — Rekhta Pataulvi
धोका खाने के हम आदी है किस क़दर अब के भी उन के धोके में हम आ गए — Rekhta Pataulvi
हज़ारों आंधियाँ तूफ़ान आए और गए यारो चराग़-ए-रेख़्ता मद्धम सही पर अब भी जलता है — Rekhta Pataulvi
रेख़्ता हाथ में ज़मीं भी नहीं बात करते हो आसमानों की — Rekhta Pataulvi
महफ़िल में कौन आया है साग़र लिए हुए इक ख़ास कैफ़ियत का समुंदर लिए हुए — Rekhta Pataulvi
नसीब अपना है रूठे हुए सनम की तरह अगर ख़ुशी कभी मिलती भी है तो ग़म की तरह — Rekhta Pataulvi
था झूठा वा'दा मगर ए'तिबार हम ने किया तमाम रात तेरा इंतिज़ार हम ने किया — Rekhta Pataulvi
जुदाई इश्क़ का दस्तूर क्यूँँ है हम नहीं समझे मोहब्बत इस क़दर मजबूर क्यूँँ है हम नहीं समझे — Rekhta Pataulvi
अपनी शोहरत अपनी कुर्सी अपना मतलब है अज़ीज़ क़ौम से क्या लेना, थोड़ी सी रवादारी बहुत — Rekhta Pataulvi
मज़लूम को कुछ लोग बुरा कहने लगे हैं ज़ालिम को बजा कहने का अंदाज़ तो देखो — Rekhta Pataulvi
दस्तूर बन रहे हैं बड़ी धूमधाम से साज़िश भी हो रही है बड़े एहतिमाम से — Rekhta Pataulvi
मस्त है तारीख़ अपने हाल में इस को मुस्तक़बिल का अंदाज़ा नहीं — Rekhta Pataulvi
ए लो अख़बार भी क़ानून भी मुंसिफ़ भी बिके किस में हिम्मत है हक़ीक़त को हक़ीक़त लिक्खे — Rekhta Pataulvi
सारे हुक़ूक़ छीन चुके मेरे घर के लोग अपने ही घर में रहता हूँ मेहमान की तरह — Rekhta Pataulvi
हलचल मची हुई थी दिल-ए-बेक़रार में सिगरेट पी रहा था तेरे इंतिज़ार में — Rekhta Pataulvi
मैं अपनी राह अलग ख़ुद बनाके चलता हूँ वो और होंगे जो नक़्शे कदम पे चलते हैं — Rekhta Pataulvi

Ghazal

Nazm

"उर्दू" हिंद की ताजदार है उर्दू इस चमन की बहार है उर्दू लखनऊ की नज़ाकतों की क़सम दिलबर-ए-तरहदार है उर्दू दिल्ली वालों के दिल को लूट लिया शौख़ चंचल निगार है उर्दू लाल क़िलऐ की रौनक़ों की क़सम जलवा-ए-सदबहार है उर्दू फ़ख़्र से कह रहा है ताजमहल इश्क़ की यादगार है उर्दू रेख़्ती बेगमात की ज़ीनत शह ज़फ़र का वक़ार है उर्दू मीर-ओ-ग़ालिब, नज़ीर-ओ- मोमिन क्या दाग़ का भी क़रार है उर्दू नासिख़-ओ-मुसहफ़ी, नसीर और ज़ौक़ सैकड़ों का क़रार है उर्दू यास, इंशा हो या अनीस-ओ-दबीर सारे यारों की यार है उर्दू आतिश-ओ-दर्द के तसव्वुफ़ की ख़ूब आईनादार है उर्दू हाँ जलाल-ओ-जलील और अकबर सब को करती शिकार है उर्दू उलझे जोश-ओ-फ़िराक़ और चकबस्त दाम-ए-गेसू-ए-यार है उर्दू साइल-ओ-बेख़ुद-ओ-रसा उलझे गेसु-ए-ताबदार है उर्दू नब्ज़ देखेंगे ड़ॉक्टर इक़बाल दर्द से बेक़रार है उर्दू हाली हसरत हफ़ीज़ भी हैं फ़िदा वो उरुस-ए-बहार है उर्दू हाँ! अदम और मजाज़ से पूछो लज़्ज़त-ए-सदख़ुमार है उर्दू पूछो अख़्तर शकील-ओ-साहिर से जान-ए-नग़मानिगार है उर्दू कैफ़ी मजरूह हसरत-ओ-अंजान गीतकारों की यार है उर्दू क़िस्मत-ए-दुख्तर-ए-ब्रज भाषा दुश्मनी का शिकार है उर्दू रेख़्ता अहल-ए-हिन्द से पूछो क्यूँँ गरीबुद्दियार है उर्दू — Rekhta Pataulvi
"ज़िंदगी" इक तरफ़ लहलहाता चमन ज़िंदगी इक तरफ़ है ख़िज़ाँ और घुटन ज़िंदगी इक तरफ़ हिम्मत-ओ-हौसला, अज़्म भी इक तरफ़ उल्झनें और थकन ज़िंदगी ज़िंदगी एक पहेली है और ख़ुद ही हल अब कहो क्या है ऐ अहल-ए-फ़न ज़िंदगी नींद भी ख़्वाब भी और ता'बीर भी इक तिलस्म-ए- पुरअसरार-ओ- फ़न ज़िंदगी सल्तनत, तख्त-ओ-ताज और शहंशाह भी तौक़, ज़ंजीरें, दार-ओ-रसन ज़िंदगी सरहदों पर निगहबान भी,घात भी मौजज़न ज़िंदगी, दिलशिकन ज़िंदगी ये ही जश्न-ओ-चराग़ाँ है और क़हक़हे मातम-ओ-मर्सिया, नौहाज़ान ज़िंदगी ये ही शतरंज के मोहरे, ये ही बिसात हार और जीत का एक चलन ज़िंदगी रहगुज़र भी है राही भी मंज़िल भी ख़ुद राहबर भी ज़िंदगी राहज़न ज़िंदगी ख़ुद हक़ीक़त है और ख़ुद ही अफसाना भी राज़ है अज़- ज़मीं तागगन ज़िंदगी ये ही महफिल भी हंगामा सन्नाटा भी ख़ुद ही संजीदा ख़ुद बाँकपन ज़िंदगी ज़िंदगी है के पानी का इक बुलबुला फिर भी है किस क़दर मौजज़न ज़िंदगी है यही ज़िंदगी एक फूलों की सेज और कभी काँटों की है चुभन ज़िंदगी आशना और शनासा भी अंजान भी बावतन ज़िंदगी बेवतन ज़िंदगी — Rekhta Pataulvi
"तराना-ए-वतन" ख़्वाबों का गुल्सिताँ है तू, अरमानों का चमन जन्नत से कम नहीं है तू मेरे लिए वतन इक गीत मैं ने लिक्खा है तेरे लिए वतन ख़्वाबों का गुल्सिताँ है तू, अरमानों का चमन परबत हिमाला अज़्म का परचम कहें जिसे गंग-ओ-जमन हैं प्यार का संगम कहें जिसे झरनों से फूटी है नई उम्मीद की किरन ख़्वाबों का गुल्सिताँ है तू,अरमानों का चमन गौतम रहीम नानक और चिश्ती-ओ-कबीर पैग़ाम लाए प्यार मोहब्बत का सब फ़क़ीर इंसानियत का सब को सिखाकर गए चलन ख़्वाबों का गुल्सिताँ है तू,अरमानों का चमन बढ़ने ना पाए हिंदू-मुसलमाँ में फ़ासले सब एक हैं जवाँ हैं अभी अपने हौसले हाँ! गुलज़मीन-ए-हिंद पे क़ुर्बान है गगन ख़्वाबों का गुल्सिताँ है तू,अरमानों का चमन हम एक हैं हम एक हैं गूंजे वही सदा अपने वतन पे कर देंगे हम जान-ओ-तन फ़िदा अपने सरों से बांधके निकले हैं हम कफ़न ख़्वाबों का गुल्सिताँ है तू, अरमानों का चमन — Rekhta Pataulvi