Ahmad Shanas

Ahmad Shanas

@ahmad-shanas

Ahmad Shanas shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ahmad Shanas's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

0

Content

17

Likes

0

Shayari
Audios
  • Ghazal
तसव्वुर को जगा रक्खा है उस ने
दरीचा नीम वा रक्खा है उस ने

ज़रा सा फूल मेरे बाग़ में है
बहुत कुछ मावरा रक्खा है उस ने

बिना देखे गवाही माँगता है
सवाल अपना जुदा रक्खा है उस ने

मिरे होने से ख़ुद मेरा तअल्लुक़
ब-रंग-ए-इंतिहा रक्खा है उस ने

मिटा देता है हर तस्वीर मेरी
मुझे अपना बना रक्खा है उस ने

हमारी प्यास क़तरों में लिखी है
मगर दरिया बहा रक्खा है उस ने

ये सूरज चाँद तारों का ज़माना
बस इक लम्हा जला रक्खा है उस ने

बनावट बरमला फूलों की सूरत
कि ख़ुशबू को छुपा रक्खा है उस ने

खड़ी है राह रोके ख़ुद-फ़रेबी
मुझे वापस बुला रक्खा है उस ने

हवा का है न पानी का करिश्मा
नफ़स को ख़ुद जला रक्खा है उस ने

मुझे बे-नाम कर देता है 'अहमद'
कि नाम अपना ख़ुदा रक्खा है उस ने
Read Full
Ahmad Shanas
ये वक़्त रौशनी का मुख़्तसर है
अभी सूरज तुलू-ए-मुंतज़र है

शहादत लफ़्ज़ की दुश्वार-तर है
किताबों में बहुत ज़ेर-ओ-ज़बर है

अभी खुलने को है दर आसमाँ का
अभी इज़हार का प्यासा बशर है

ये दुनिया एक लम्हे का तमाशा
न जाने दूसरा लम्हा किधर है

जो देखा है वो सब कुछ है हमारा
जो अन-देखा है वो उम्मीद भर है

मैं ख़ुद ख़ाशाक-ए-गिरवीदा हूँ वर्ना
मिरे हाथों में तिनका शाह पर है

फिर इस के ब'अद बस हैरानियाँ हैं
ख़बर वाला भी ख़ासा बे-ख़बर है

मिरा नारा है जंगल आग जैसा
मिरा कलमा शिकस्ता बाल-ओ-पर है

ज़बाँ मेरी सियासत चाटती है
कि इस का ज़ाइक़ा शीर-ओ-शकर है

ये अंधी प्यास का मौसम है 'अहमद'
समुंदर रौशनी का बे-असर है
Read Full
Ahmad Shanas
फूलों में एक रंग है आँखों के नीर का
मंज़र तमाम-तर है ये फ़स्ल-ए-ज़मीर का

रिश्ता वो क्या हुआ मिरी आँखों से नीर का
मुद्दत हुई है हादसा देखे ज़मीर का

पानी उतर गया तो ज़मीं संगलाख़ थी
तीखा सा हर सवाल था राँझे से हीर का

तेरी अज़ाँ के साथ मैं उठता हूँ पौ फटे
सर में लिए हुए कोई सज्दा असीर का

देखा न दोस्तों ने इमारत के उस तरफ़
पूछा कभी न हाल किसी ने फ़क़ीर का

आईना गिर पड़ा था मिरे हाथ से कभी
फिर याद हादसा नहीं कोई ज़मीर का

सहरा-ए-जिस्म रूह के अंदर उतर गया
अब क्या दिखाए मोजज़ा इंसाँ ज़मीर का

आँसू की एक बूँद को आँखें तरस गईं
इस धूप में झुलस गया दोहा कबीर का

आधा फ़लक के पास था आधा ज़मीन पर
मैं ना-तमाम ख़्वाब था बदर-ए-मुनीर का

पक्के हुरूफ़ गर्द की सूरत बिखर गए
सीने में घाव रह गया कच्ची लकीर का

होती रहेंगी बारिशें 'अहमद' विसाल की
ख़ाली रहेगा जाम हमेशा फ़क़ीर का
Read Full
Ahmad Shanas
मोहब्बतों को कहीं और पाल कर देखो
मता-ए-जाँ को बदन से निकाल कर देखो

बदल के देखो कभी निस्बतों की दुनिया को
बदन को रूह के ख़ाने में डाल कर देखो

सुनो उसे तो समाअत से मावरा हो कर
जो देखना हो तो आँखें निकाल कर देखो

यक़ीन दश्त से फूटेगा आब-ए-जू की तरह
कि हर्फ़-ए-''ला'' की गवाही बहाल कर देखो

नफ़स नफ़स है यहाँ मक़बरा अक़ीदत का
ये मक़बरों का जहाँ पाएमाल कर देखो

इसी हवा में मोहब्बत का दीप जलता है
इसी जहाँ को जहान-ए-विसाल कर देखो

वो संग दे तो हरारत निचोड़ लो अपनी
जो फूल दे तो निगाह-ए-कमाल कर देखो

फिर उस के ब'अद कोई डर नहीं तलातुम का
उस एक बूँद के ग़म को विशाल कर देखो

बदन की प्यास भी इक मावरा कहानी है
हर एक बूँद को दरिया ख़याल कर देखो

पलट के आएँगे सावन के रंग आँखों में
तुम अपने-आप से रिश्ता बहाल कर देखो

वो बोलता है पहाड़ों की ओट से अक्सर
किसी पहाड़ से उस का सवाल कर देखो

ये राज़ और कहाँ तक हमें निभाना है
कभी तो रात में सूरज निकाल कर देखो

तुम अपने गौहर-ए-यकता को इस तरह ढूँडो
कि ख़ुद को बे-सर-ओ-सामाँ ख़याल कर देखो

जो देखना हो कभी दोस्तों का दिल 'अहमद'
खरे उसूल का पत्ता उछाल कर देखो
Read Full
Ahmad Shanas
है वाहिमों का तमाशा यहाँ वहाँ देखो
हमारे पास मुकम्मल ख़ुदा कहाँ देखो

दिल-ओ-दिमाग़ के अंदर अना की गूँज सुनो
बला सी कोई लहू में रवाँ-दवाँ देखो

नफ़स का साँप कहाँ ज़ेर होने वाला है
फिर इस के ब'अद कोई और इम्तिहाँ देखो

अब अपने घर के लिए इक नई ज़मीं सोचो
ज़मीं के सर पे कोई ताज़ा आसमाँ देखो

इस इक सवाल के कितने अज़ाब झेल चुका
कुछ और दर्द बनू और इम्तिहाँ देखो

गुज़र के जाना है वहशत के एक दरिया से
यक़ीं न हो तो यहाँ रास्ता कहाँ देखो

कहाँ से आएगी अब रौशनी मोहब्बत की
बहुत धुआँ है मकानों के दरमियाँ देखो

मैं बे-यक़ीन हूँ ऐसा कि मेरे हाथों में
तमाम आयतें सूरज की राएगाँ देखो

फटा हुआ किसी उर्यां सवाल जैसा है
हमारे सर पे ये रहमत का साएबाँ देखो

निशान रेत के आए हैं मेरे हिस्से में
निकल गया है बहुत दूर कारवाँ देखो

मसीह मौत का पैग़ाम ले के आया है
अब और कौन बचाएगा मेरी जाँ देखो

मिरे हुरूफ़ अधूरी उड़ान जैसे हैं
मिरा शुऊर मआनी का आसमाँ देखो

वो एक लम्हा हयात-आश्ना लिखो 'अहमद'
वगर्ना सारी कहानी ही राएगाँ देखो
Read Full
Ahmad Shanas
बस इक जहान-ए-तहय्युर से आने वाला है
वो अजनबी मुझे अपना बनाने वाला है

गुलाब संग की सूरत दिखाने वाला है
कहाँ कहाँ वो मुझे आज़माने वाला है

कोई तो देखने वाला है मेरी आँखों से
कोई तो है जो तमाशा दिखाने वाला है

ये चाँद और सितारे तो इक बहाना हैं
कुछ और है जो यहाँ जगमगाने वाला है

हर एक जिस्म यहाँ रूह की अलामत है
ये रेगज़ार भी नग़्मा सुनाने वाला है

बस इक सवाल की तख़्लीक़ है बशर जैसे
कहाँ से आया है किस ओर जाने वाला है

उसे ख़बर है कहाँ रौशनी का माख़ज़ है
वो तीरगी में दिलों को जलाने वाला है

अमीर उस की अमानत उठा नहीं सकता
फ़क़ीर असल में उस का ख़ज़ाने वाला है

वो एक प्यास का लम्हा जो मेरे अंदर है
कभी कभी तो समुंदर लुटाने वाला है

वो ख़ाकसार को देता है फूल हिस्से में
वो संग-ज़ार में दरिया बहाने वाला है

बहुत अज़ीज़ है ज़ेर-ओ-ज़बर का खेल उसे
बुझा बुझा के तमन्ना जगाने वाला है

वो एक गौहर-ए-यकता है मेरे सागर में
वो एक अश्क कि आँखों में आने वाला है

समर को बाँध के रखता है वो दरख़्तों पर
जो पक गया उसे नीचे गिराने वाला है

वो अपने आप ही घर लौट आएगा 'अहमद'
किसी को कौन हमेशा बुलाने वाला है
Read Full
Ahmad Shanas
जिस्म के बयाबाँ में दर्द की दुआ माँगें
फिर किसी मुसाफ़िर से रौशनी ज़रा माँगें

खो गए किताबों में तितलियों के बाल-ओ-पर
सोच में हैं अब बच्चे क्या छुपाएँ क्या माँगें

ज़ा'फ़रानी खेतों में अब मकान उगते हैं
किस तरह ज़मीनों से दिल का राब्ता माँगें

हम भी हो गए शामिल मसनूई तिजारत में
हम कि चेहरा-सामाँ थे अब के आइना माँगें

वर्ना इल्म नामों का उठ न जाए धरती से
आदमी फले-फूले आओ ये दुआ माँगें

इस से पेशतर कि ये रात मूँद ले आँखें
नन्हे-मुन्ने जुगनू से रौशनी ज़रा माँगें

वो सदाएँ देता है आख़िरी जज़ीरे से
और हम निगाहों का हुस्न-ए-इब्तिदा माँगें

किस के सामने रखिए खोल कर रज़ा अपनी
और किस से जादू का बोलता दिया माँगें
Read Full
Ahmad Shanas
यहाँ हर लफ़्ज़ मअनी से जुदा है
हक़ीक़त ज़िंदगी से मावरा है

अभी चेहरे का ख़ाका बन रहा है
अभी कुछ और भी मेरे सिवा है

हमें जो कुछ मिला नाक़िस मिला है
मगर ख़ुश-फ़हमियों की इंतिहा है

कोई चेहरा नहीं ख़ुशबू का लेकिन
तमाशा फूल वालों का लगा है

मैं उस की बारिशों का मुंतज़िर हूँ
वो मुझ से मेरे आँसू माँगता है

यही बाइस है मेरी तिश्नगी का
समुंदर मुझ से पानी माँगता है

जहालत रोग था जो दिल के अंदर
वही मज़हब हमारा हो गया है

मुक़द्दस हो गया है झूट मेरा
मुझे तो अब उसी का आसरा है

मैं प्यासा हूँ पुराने मौसमों का
मगर अब वो ज़माना जा चुका है

कहानी बर्ग-ए-सोज़ाँ से इबारत
वगर्ना बहर-ओ-बर भी हाशिया है

नहीं है ख़्वाब सी तस्वीर जिस की
तो फिर उस ख़्वाब की ताबीर क्या है

गुमाँ हंगामा-आराई का आदी
यक़ीं तन्हाइयों में बोलता है

ये दुनिया बे-ख़बर लोगों की 'अहमद'
वो दुनिया का नहीं जो जानता है
Read Full
Ahmad Shanas
मेरी रातों का सफ़र तूर नहीं हो सकता
तू न चाहे तो बयाँ नूर नहीं हो सकता

मैं ने हिजरत के कई दौर कड़े देखे हैं
मैं किताबों से कभी दूर नहीं हो सकता

मेरी फ़ितरत कि मैं खिल जाता हूँ बे-मौसम भी
मेरी आदत कि मैं मजबूर नहीं हो सकता

तू ने किस शौक़ से लिक्खा है तआरुफ़ मेरा
मैं किसी लफ़्ज़ में महसूर नहीं हो सकता

मेरे अंदर भी तिरे नाम की चिंगारी है
तू मिरे वास्ते क्यूँ तूर नहीं हो सकता

जो यहाँ लफ़्ज़ की सरहद के उधर रहता है
बस्तियों में कभी मशहूर नहीं हो सकता

ज़िंदा इंसाँ उसे आबाद किया करते हैं
घर किसी ख़्वाब से मामूर नहीं हो सकता

घर के बाहर सभी लफ़्ज़ों के तमाशाई हैं
घर के अंदर कोई मसरूर नहीं हो सकता

जिस्म के सारे तक़ाज़े हैं अधूरे 'अहमद'
ये तसव्वुर कभी भरपूर नहीं हो सकता
Read Full
Ahmad Shanas
सुब्ह-ए-वजूद हूँ कि शब-ए-इंतिज़ार हूँ
मैं आश्कार हूँ कि पस-ए-आश्कार हूँ

हर रंग-ए-बे-क़रार हूँ हर नक़्श-ए-ना-तमाम
मिट्टी का दर्द हूँ कि सितारों का प्यार हूँ

कुछ तो मिरे वजूद का हिस्सा है तेरे पास
वर्ना मैं अपने आप में क्यूँ इंतिज़ार हूँ

इक और आसमान चमकता है ख़्वाब में
इक और काएनात का आईना-दार हूँ

तू ने मुझे ख़याल किया था इसी तरह
गर्द-ओ-ग़ुबार में भी सितारा-शिआर हूँ

जारी हो बे-महार तअल्लुक़ की सलसबील
इक ऐसी बर्शगाल का उम्मीद-वार हूँ

कैसे खड़ा हूँ किस के सहारे खड़ा हूँ मैं
अपना यक़ीन हूँ कि तिरा ए'तिबार हूँ

इक बार अपने घर से निकाला गया था मैं
फिर इस के ब'अद गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार हूँ

बस कुछ दिनों की और सऊबत है धूप की
सहरा-ए-जिस्म पार कोई बर्ग-ज़ार हूँ

तेरे जमाल से मिरी आँखों में नूर है
तेरा ख़याल है तो मैं बाग़-ओ-बहार हूँ

साँसों के दरमियान सुलगते हैं बाल-ओ-पर
फिर भी किसी उड़ान का उम्मीद-वार हूँ

'अहमद' किसी ज़मान-ओ-मकाँ का नहीं हूँ मैं
लम्हों की देर है जो सर-ए-आबशार हूँ
Read Full
Ahmad Shanas
इमरोज़ की कश्ती को डुबोने के लिए हूँ
कल और किसी रंग में होने के लिए हूँ

तू भी है फ़क़त अपनी शहादत का तलबगार
मैं भी तो इसी दर्द में रोने के लिए हूँ

जीने का तक़ाज़ा मुझे मरने नहीं देता
मर कर भी समझता हूँ कि होने के लिए हूँ

हाथों में मिरे चाँद भी लगता है खिलौना
ख़्वाबों में फ़लक रंग समोने के लिए हूँ

हर बार ये शीशे का बदन टूट गया है
हर बार नए एक खिलौने के लिए हूँ

परदेस की रातों में बहुत जाग चुका मैं
अब घर का सुकूँ ओढ़ के सोने के लिए हूँ

सीने में कोई ज़ख़्म कि खुलने के लिए है
आँखों में कोई अश्क कि रोने के लिए हूँ

सादा सी कोई बात नहीं भूक शिकम की
ईमान भी रोटी में समोने के लिए हूँ

वो दश्त-ओ-बयाबान में इज़हार का ख़्वाहाँ
मैं अपने चमन-ज़ार में रोने के लिए हूँ

ग़ारों का सफ़र है कि मुकम्मल नहीं होता
मैं अपनी ख़बर आप ही ढोने के लिए हूँ

सूरज को निकलने में ज़रा देर है 'अहमद'
फिर ज़ात का हर रंग मैं खोने के लिए हूँ
Read Full
Ahmad Shanas