Akhtar Wajidi

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@akhtar-wajidi

Akhtar Wajidi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Akhtar Wajidi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
निगाहों ही निगाहों में इशारे होते जाते हैं
वो अब आहिस्ता आहिस्ता हमारे होते जाते हैं

जो ज़ाहिर हुस्न के रंगीं नज़ारे होते जाते हैं
निगाह-ए-शौक़ में वो और प्यारे होते जाते हैं

ख़ुदा रक्खे हवादिस को तलातुम को मसाइब को
हमारी ज़िंदगानी के सहारे होते जाते हैं

तुम्हारे ग़म ने ऐसा एहतिराम-ए-ग़म सिखाया है
कि दुनिया भर के ग़म सारे हमारे होते जाते हैं

तसल्ली भी बड़ी मुश्किल से मिलती है तसव्वुर में
ग़लत-फ़हमी सलामत वो हमारे होते जाते हैं

जहाँ सोज़-ए-ग़म-ए-फ़ुर्क़त फ़ज़ा-ए-दिल को झुलसा दे
वहाँ ख़ुश-रंग आँसू भी शरारे होते जाते हैं

तिरे जलवों ने ऐसी तर्बियत दी है निगाहों को
नज़र में जज़्ब अब सारे नज़ारे होते जाते हैं

गुदाज़-ए-क़ल्ब की दौलत अता की है मोहब्बत ने
बहुत शाइस्ता तेरे ग़म के मारे होते जाते हैं

कोई शय जल रही है ग़ालिबन सीने में ऐ 'अख़्तर'
कि मेरे शबनमी आँसू शरारे होते जाते हैं
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Akhtar Wajidi
नहीं मिलते जहाँ में ज़ख़्म-ए-पिन्हाँ देखने वाले
बहुत मिल जाएँगे चाक-ए-गरेबाँ देखने वाले

ख़ुदा जाने ये क्या तासीर है ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ में
परेशाँ हैं तिरी ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ देखने वाले

नज़र के होश उड़ जाते हैं बाज़-औक़ात उजाले में
नज़र रक्खें अंधेरे में चराग़ाँ देखने वाले

तुम्हें तूफ़ाँ से क्या निस्बत तुम्हें साहिल पे रहना है
सलामत हैं अभी हम ज़ोर-ए-तूफ़ाँ देखने वाले

यहाँ इंसानियत की नब्ज़ है बेचैन रुकने को
ख़ुदा जाने कहाँ हैं नब्ज़-ए-दौराँ देखने वाले

दिल-ए-पुर-दर्द में कुछ दाग़ रौशन हम भी रखते हैं
इधर आएँ ज़रा बज़्म-ए-चराग़ाँ देखने वाले

तसव्वुर में सफ़र नज़रों का किस से तय हुआ 'अख़्तर'
कहाँ हैं उन को नज़दीक-ए-रग-ए-जाँ देखने वाले
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मजबूर-ए-शब को सुब्ह का मुख़्तार देख कर
हैराँ है अक़्ल वक़्त की रफ़्तार देख कर

बीमार को है आप के आने का इंतिज़ार
सब रो रहे हैं हालत-ए-बीमार देख कर

अहबाब की तसल्लियाँ ख़ुद ज़ख़्म बन गईं
घबरा रहा हूँ कसरत-ए-ग़म-ख़्वार देख कर

अंजाम-ए-फ़स्ल-ए-गुल पे है मेरी निगाह दोस्त
ख़ूँ रो रहा हूँ रंग-ए-चमन-ज़ार देख कर

किस ने फ़लक का चाँद ज़मीं पर बिछा दिया
आया ख़याल रहगुज़र-ए-यार देख कर

शबनम हो जैसे दामन-ए-नर्गिस में ख़ंदा-ज़न
समझा मैं उन की चश्म-ए-गुहर-बार देख कर

फिर मेरे ग़ौरो-ओ-फ़िक्र की क़िस्मत जगा भी दे
मुद्दत हुई है तुझ को ज़िया-बार देख कर

'अख़्तर' सुकून-ए-दिल के सिवा थी हर एक शय
हम लौट आए रौनक़-ए-बाज़ार देख कर
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