Alimullah

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Alimullah shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Alimullah's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
राह में हक़ के अज़ीज़ाँ आप को क़ुर्बां करो
या नहीं उस पर तसद्दुक़ अपना जिस्म-ओ-जाँ करो

सालिकाँ कब लग चलोगे रह में हक़ के मोर चल 'इश्क़ की तेज़ी को अपने छेड़ कर जौलाँ करो

काँ तलक ख़ातिर रखोगे आरज़ू में तंग कर
ग़ुंचा-दिल बाद-ए-सबा सूँ 'इश्क़ के ख़ंदाँ करो

अक़्ल-ए-नफ़सानी तुमन में बुर्क़ा-ए-हैवान है
फाड़ कर पर्दा नज़र का आप को इंसाँ करो

ख़ाना-ए-दिल को रखो आबाद हक़ की याद सूँ 'इश्क़ की आतिश सूँ तन को जाल कर वीराँ करो

तोड़ कर तन को करो बारीक पर्दे की मिसाल
शम्-ए-नूरानी लगा फ़ानूस-ए-तन ताबाँ करो

देखते रहो रोज़-ओ-शब अँखियाँ सूँ तुम रब का जमाल
नैन की थाली में इस को ज्यूँँ दुर-ए-ग़लताँ करो

फेरते रहो दीद का मनका नज़र के तार में
रात दिन अँखियाँ को अपनी इस तरफ़ गर्दां करो
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Alimullah
ग़फ़लत में सोया अब तिलक फिर होवेगा होश्यार कब
यारी लगाया ख़ल्क़ सूँ पावेगा अपना यार कब

झूटी मोहब्बत बाँध कर ग़ाफ़िल रहा अपने सूँ हैफ़
बुलबुल हूँ सँपड़ा दाम में देखेगा फिर गुलज़ार कब

ये ख़्वाब-ओ-ख़ुर फ़रज़ंद-ओ-ज़न और माल-ओ-ज़र ज़िंदाँ हुआ
तो छूट कर इस क़ैद सूँ हासिल करे दीदार कब

हिर्स-ओ-हवा बुग़्ज़-ओ-हसद किब्र-ओ-मनी बुख़्ल ओ जहल
इस रह-ज़नान सूँ बाच कर होवेगा बर-ख़ुरदार कब

इस नफ़्स-ए-काफ़िर-कश की ख़सलत तुझे मालूम नहीं
गर क़त्ल कीता नहीं उसे तुझ को मिले दिलदार कब

बिन पीर पहुँचा नहीं कभी कुइ साहिल-ए-मक़्सूद को
मल्लाह बिन कश्ती कहीं होती है दरिया पार कब

बर-हक़ 'अलीमुल्लाह' कहा रब क़ौल यहदी-मैं-यशा
जन्नत के तालिब को कहो आवे नज़र दीदार कब
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Alimullah
तू है किस मंज़िल में तेरा बोल खाँ है दिल का ठार
दम तिरा आता है खाँ सूँ बोल खाँ जाता है भार

दम के तईं बूझा सो कहते इस के तईं इंसान है
नहीं तो सूरत आदमी सीरत में है मिस्ल-ए-हिमार

मैं कहता सो कौन है और तू समझता है किसे
क्यूँँ अबस मैं तू में पड़ कर बे-अबस होता है ख़्वार

राहबर है कौन तेरा बोल तू किस का फ़क़ीर
फ़क़्र का क्या हासिला समझा मुझे मत हो गंवार

आशिक़ाँ के बज़्म में इक रंग हो ऐ बुल-हवस
मत कहा बुलबुल नमन चौंडा फुला कर ताजदार

बहर के ग़व्वास से मत बहस कर ऐ ख़ाम-तब्अ
नहीं गया है 'उम्र में अपने तू दरिया के कनार

कज-बहस आता है करने जंग जब उश्शाक़ सूँ
ज्यूँँ कि तैर-ए-हफ़्त-रंगी हो गया आ कर शिकार

पूछता आया हूँ जो कुछ स्वाल का मेरे जवाब
थरथराता है अबस सीमाब नमने बे-क़रार

ता कहे लग ज्वाब तुझ पर फ़क़्र का लुक़्मा हराम
बज़्म-ए-रिंदाँ सूँ निकल जा जल्द-तर हो कर फ़रार

शोर और ग़ौग़ा अबस करता है क्यूँँ रंग कर लिबास
मुँह उठा जाता है ज्यूँँ बे-क़ैद शुत्र-ए-बे-महार

ऐ 'अलीमुल्लाह' न कर कज-बहस सूँ स्वाल ओ जवाब
हासिला तरफ़ैन नहीं होता ब-जुज़ ग़ौग़ा पुकार
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Alimullah
दिलबर को दिलबरी सूँ मना यार कर रखूँ
पीतम को अपने पीत सूँ गुलहार कर रखूँ

एक नौम सूँ जगाऊँ अगर मुर्दा दिल के तईं
ता-हश्र याद-ए-हक़ मने बेदार कर रखूँ

रहता है दिल हर एक का हर एक काम में एक
अपना ख़याल सूरत-ए-परकार कर रखूँ

दिस्ता है मुझ को यार का रुख़्सार-ए-गुल-इज़ार
तिस की ख़ुशी सूँ तब्अ को गुलज़ार कर रखूँ

मनके को मन के लाऊँ फिराने का जब ख़याल
तस्बीह बदन की तोड़ के एक तार कर रखूँ

पीतम के बाज नहीं है मिरा इख़्तियार कुछ
मुझ दिल को तिस के अम्र में मुख़्तार कर रखूँ

बे-सर अगर अछे तो उसे सर करूँँ अता
दोनों जहाँ में साहिब-ए-असरार कर रखूँ

अंधे के तईं 'अलीम' लगा 'इश्क़ का अंजन
सब वासिलाँ में वासिल-ए-दीदार कर रखूँ
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Alimullah
अक़्ल-ए-जुज़वी छोड़ कर ऐ यार फ़िक्र-ए-कुल करो
मिशअल-ए-दिल को चिता फ़ानी चराग़ाँ गुल करो

दिल लगाओ एक से दोनों जहाँ जिस का ज़ुहूर
बुल-हवस हो कर न हरगिज़ आदत-ए-बुलबुल करो

मैं मोहब्बत सूँ हमेशा 'इश्क़ में सरशार हूँ
नश्शा-ए-फ़ानी सूँ मत ख़ातिर को ख़ू-ए-मुल करो

ज़ुल्फ़-ओ-आरिज़ है मुनव्वर देख वज्हुल्लाह का
तुम न को सैर-ए-चमन और ख़्वाहिश-ए-सुम्बुल करो

क़ौल पर ला-तक़्नतू के रहो हमेशा जम्अ'-दिल
मत तुम्हें ख़ातिर परेशाँ सूरत-ए-काकुल करो

ख़ौफ़ मत रक्खो किसी दुश्मन से दिल में यक रती
पुश्त-बाँ अपना हमेशा साहब-ए-दुलदुल करो

ऐ 'अलीमुल्लाह' अव्वल 'इश्क़ में मिस्मार हो
आशिक़ों में बा'द अपने आशिक़ी का ग़ुल करो
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Alimullah
ख़यालात रंगीं नहीं बोलते उस को ज्यूँँ बास फूलों के रंगों में रहिए
दो-रंगी सूँ जाना गुज़र दिल सूँ अव्वल बज़ाँ जा के वाँ एक रंगों में रहिए

वो वहशत के जंगल में हो कर परेशाँ पहाड़ों से ग़म के न हो संग हरगिज़
शरर हो के छिड़ संग तिनके सूँ जल्दी सकल रूह हो बर्क़ रंगों में रहिए

नहीं मौज-ए-दरिया की दहशत उसे जो कि मारा है ग़ोता हो ग़व्वास दिल में
तह-ए-बहर-ए-वहदत में ग़व्वास होने को तालीम पाने नहंगों में रहिए

शहादत मिले चार तन सूँ तुझे गर करे क़त्ल तू पाँच मूज़ियाँ कूँ दिल के
शहीदों की रह साथ हर वक़्त हमदम हो ज्यूँँ शे'र शे'रान जंगों में रहिए

फ़लक चर्ख़-ए-कज-रौ सूँ देखे अगर ख़ूब नैरंग-बाज़ी ज़माने की हिकमत
गुज़र ग़ैर सोहबत सूँ मदहोश हो जा पहाड़ों में जा कर भुजंगों में रहिए

समझ ऐ 'अलीम' आज राह-ए-हक़ीक़त निपट सख़्त मुश्किल है जाँ सूँ गुज़रना
पतंग हो के जलने में वासिल रहें हक़ सूँ हो मर्द-ए-वाहिद यकंगों में रहिए
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