गुरेज़-पा है जो मुझ से तिरा विसाल तो क्या
मिरा जुनूँ भी है आमादा-ए-ज़वाल बहुत
मुझे हर आन ये देता है वस्ल की लज़्ज़त
वफ़ा-शनास है तुझ से तिरा ख़याल बहुत
किताब-ए-ज़ीस्त के हर इक वरक़ पे रौशन हैं
ये तेरी फ़र्दा-निगाही के ख़द-ओ-ख़ाल बहुत
पलट गए जो परिंदे तो फिर गिला क्या है
हर एक शाख़-ए-शजर पर बिछे हैं जाल बहुत
तुम्हें है नाज़ अगर अपने हुस्न-ए-सरकश पर
तो मेरा इश्क़ भी है रू-कश-ए-जमाल बहुत
अज़ान-ए-सुब्ह की हर लय की तार टूट गए
फ़रोग़-ए-ज़ुल्मत-ए-शब का है ये कमाल बहुत
किसी भी प्यास के मारे की प्यास बुझ न सकी
समुंदरों में तो आते रहे उछाल बहुत
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दरोग़-ए-मस्लहत के देख कर आसार चेहरों पर
हक़ीक़त-आश्ना आँखों की हैरानी नहीं जाती
निशान-ए-ख़ुसरवी तो मिट गए हैं लौह-ए-आलम से
कुलाह-ए-ख़ुसरवी से बू-ए-सुल्तानी नहीं जाती
अँधेरा इस क़दर है शहर पर छाया सियासत का
किसी भी शख़्स की अब शक्ल पहचानी नहीं जाती
ज़माना कर्बला का नाम सुन कर काँप उठता है
अभी तक ख़ून-ए-शब्बीरी की जौलानी नहीं जाती
फ़ुज़ूँ-तर और होते जा रहे हैं चाक दामन के
रफ़ू-गर से हमारी चाक-दामानी नहीं जाती
ये माना रौशनी को पी गई ज़ुल्मत जिहालत की
मगर इस ज़र्रा-ए-ख़ाकी की ताबानी नहीं जाती
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ये और बात मकीनों को कुछ ख़बर न हुई
लगा रहे थे मुहाफ़िज़ मगर नक़ब कब से
कोई भी हर्बा-ए-तश्हीर कार-गर न हुआ
तमाशबीं ही रही शोहरत-ए-अदब कब से
उखड़ गई हैं तनाबें सितम के ख़ेमों की
उलट गई है बिसात-ए-हसब-नसब कब से
न हौसला है दुआ का न आह पर है यक़ीं
कि हम से रूठ गया है हमारा रब कब से
समुंदरों से कोई मौज-ए-सर-बुलंद उठे
कि साहिलों पे तड़पते हैं जाँ-ब-लब कब से
वो हम ने चुन दिए तन्क़ीद की सलीबों पर
मचल रहे थे जो कुछ हर्फ़ ज़ेर-ए-लब कब से
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पूछा सुबुक सरों का नुमाइंदा कौन है
सुन कर फ़क़ीह-ए-शहर की दस्तार बोल उठी
अहल-ए-सितम के ख़ौफ़ से जो चुप थी वो ज़बाँ
जब बोलने पे आई सर-ए-दार बोल उठी
मेरी तबाहियों की है इस में ख़बर ज़रूर
अज़ ख़ुद हर एक सुर्ख़ी-ए-अख़बार बोल उठी
चेहरा था ज़ख़्म ज़ख़्म कोई पूछता न था
यूसुफ़ बने तो गर्मी-ए-बाज़ार बोल उठी
इक नाख़ुदा ही यूरिश-ए-तूफ़ाँ पे चुप रहा
चप्पू कभी तो और कभी पतवार बोल उठी
कुछ इस तरह से नक़्श थे ईंटों पे साँचे के
ज़िंदाँ में मुझ को देख के दीवार बोल उठी
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दर्द-ए-हिजरत के सताए हुए लोगों को कहीं
साया-ए-दर भी नज़र आए तो घर लगता है
एक साहिल ही था गिर्दाब-शनासा पहले
अब तो हर दिल के सफ़ीने में भँवर लगता है
बज़्म-ए-शाही में वही लोग सर-अफ़राज़ हुए
जिन के काँधों पे हमें मोम का सर लगता है
खा लिया है तो उसे दोस्त उगलते क्यूँ हो
ऐसे पेड़ों पे तो ऐसा ही समर लगता है
अज्नबिय्यत का वो आलम है कि हर आन यहाँ
अपना घर भी हमें अग़्यार का घर लगता है
शब की साज़िश ने उजालों का गला घूँट दिया
ज़ुल्मत-आबाद सा अब नूर-ए-सहर लगता है
मंज़िल-ए-सख़्त से हम यूँ तो निकल आए हैं
और जो बाक़ी है क़यामत का सफ़र लगता है
घर भी वीराना लगे ताज़ा हवाओं के बग़ैर
बाद-ए-ख़ुश-रंग चले दश्त भी घर लगता है
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तिश्नगी-ए-लब पे हम अक्स-ए-आब लिक्खेंगे
जिन का घर नहीं कोई घर के ख़्वाब लिखेंगे
जिन का घर नहीं कोई घर के ख़्वाब लिखेंगे
तुम को क्या ख़बर इस की ज़िंदगी पे क्या बीती
ज़िंदगी के ज़ख़्मों पर हम किताब लिक्खेंगे
जिस हवा ने काटी हैं ख़ामुशी की ज़ंजीरें
उस हवा के लहजे को इंक़लाब लिक्खेंगे
झूट की परस्तिश में उम्र जिन की गुज़री है
तीरगी-ए-शब को वो आफ़्ताब लिक्खेंगे
शे'र की सदाक़त पर हम यक़ीन रखते हैं
मस्लहत के चेहरों को बा-नक़ाब लिक्खेंगे
सूलियों पे झूलेगा बद-निहाद हर मुंसिफ़
मुंसिफ़ी का जब भी हम ख़ुद निसाब लिक्खेंगे
ग़म नहीं जो ख़्वाबों की लुट गई हैं ताबीरें
हम नज़र के ताक़ों में और ख़्वाब लिक्खेंगे
हिर्ज़-ए-जाँ समझते हैं हम वतन की मिट्टी को
अपने घर के ख़ारों को हम गुलाब लिक्खेंगे
इस ग़ज़ल के परतव में बे-घरों की बातें हैं
बे-घरों के नाम इस का इंतिसाब लिक्खेंगे
हर दलील काटेंगे हम दलील-ए-रौशन से
'बख़्श' सौ सवालों का इक जवाब लिक्खेंगे
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हुसूल-ए-मंज़िल-ए-जाँ का हुनर नहीं आया
वो रौशनी थी कि कुछ भी नज़र नहीं आया
वो रौशनी थी कि कुछ भी नज़र नहीं आया
भटक रहे हैं अभी ज़ीस्त के सराबों में
मुसाफ़िरों को शुऊर-ए-सफ़र नहीं आया
तमाम रात सितारा-शनास रोते रहे
नज़र गँवा दी सितारा नज़र नहीं आया
हज़ार मिन्नतें कीं वास्ते ख़ुदा के दिए
ये राह-ए-रास्त पे वो राहबर नहीं आया
ज़बान-ए-शेर पे मोहर-ए-सुकूत है अब तक
जलाल-ए-सौत-ओ-सुख़न रंग पर नहीं आया
वो तक रहे हैं अज़ल से फ़राज़-ए-गर्दूं पर
नज़र किसी को भी नज्म-ए-सहर नहीं आया
हमारे शहर के हर संग-बार से ये कहो
हमारी शाख़-ए-शजर पर समर नहीं आया
हर एक मोड़ पे हम ने बहुत सदाएँ दीं
सफ़र तमाम हुआ हम-सफ़र नहीं आया
दयार-ए-ग़ैर से मेरा वो सर-फिरा बेटा
गया है घर से तो फिर लौट कर नहीं आया
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बनती नहीं बात तो फिर बात क्या करें
बिगड़े हुए हैं शहर के हालात क्या करें
बिगड़े हुए हैं शहर के हालात क्या करें
आती नहीं गिरफ़्त में साँसों की डोरियाँ
हैं गर्दिश-ए-मुदाम में दिन-रात क्या करें
लफ़्ज़ों की एक फ़ौज है अपनी कमान में
मुँह में नहीं ज़बाँ तो मक़ालात क्या करें
टूटा तअ'ल्लुक़ात का हर एक सिलसिला
ठंडे पड़े हैं वस्ल के जज़्बात क्या करें
ऐ दोस्त चारा-साज़ी-ए-चारा-गराँ न पूछ
बद-तर हुए हैं और भी हालात क्या करें
ऐश-ओ-तरब की महफ़िलें उन का नसीब हैं
हम को मिले हैं दर्द के नग़्मात क्या करें
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समुंदर का तमाशा कर रहा हूँ
मैं साहिल बन के प्यासा मर रहा हूँ
मैं साहिल बन के प्यासा मर रहा हूँ
अगरचे दिल में सहरा-ए-तपिश है
मगर मैं डूबने से डर रहा हूँ
मैं अपने घर की हर शय को जला कर
शबिस्तानों को रौशन कर रहा हूँ
वही लाए मुझे दार-ओ-रसन पर
मैं जिन लोगों का पैग़म्बर रहा हूँ
वही पत्थर लगा है मेरे सर पर
अज़ल से जिस को सज्दे कर रहा हूँ
तराशे शहर मैं ने 'बख़्श' क्या क्या
मगर ख़ुद ता-अबद बे-घर रहा हूँ
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हमारे ख़्वाब चोरी हो गए हैं
हमें रातों को नींद आती नहीं है
कोई तितली कमाँ-दारों के डर से
फ़ज़ा में पँख फैलाती नहीं है
हर इक सूरत हमें भाती नहीं है
कोई सूरत हमें भाती नहीं है
जिस आज़ादी के नग़्में हैं ज़बाँ पर
वो आज़ादी नज़र आती नहीं है
बदन बे-हरकत-ओ-बे-हिस पड़े हैं
लहू की बूँद गरमाती नहीं है
मुसलसल पोश की चाबुक-ज़नी से
मिरी आशुफ़्तगी जाती नहीं है
ज़वाल-ए-फ़िक्र-ओ-फ़न की 'बख़्श' तोहमत
जलाल-ए-हर्फ़ पर आती नहीं है
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