Parveen Kaif

Top 10 of Parveen Kaif

    चाँद सूरज मिरे घर आते हैं
    क्या हसीं ख़्वाब नज़र आते हैं

    मुझ से कहते हैं ठहर दम ले ले
    राह में जितने शजर आते हैं

    देखना मेरे तख़य्युल का कमाल
    नहीं आते वो मगर आते हैं

    बर्क़ हँसती है नशेमन पे मिरे
    अब्र बा-दीदा-ए-तर आते हैं

    देख कर अपने शिकस्ता दिल को
    याद महलों के खंडर आते हैं

    है बुरा हाल उन्हें क्या मालूम
    वो भला कब मिरे घर आते हैं

    सच है पथराव तभी होता है
    जब दरख़्तों पे समर आते हैं

    फ़ोन उठाएगी न 'परवीन' उस वक़्त
    बच्चे स्कूल से घर आते हैं
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    Parveen Kaif
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    कोई किसी की तरह है कोई किसी की तरह
    बस एक आप का जल्वा है आप ही की तरह

    सिमट के ग़म के अँधेरे में लोग बैठ गए
    मगर हमें तो बिखरना था रौशनी की तरह

    ये मेरे ख़्वाब की जन्नत ये चाँद का आँगन
    यहाँ तो धूप भी लगती है चाँदनी की तरह

    नज़र में शक्ल तिरी सुब्ह-ए-आफ़्ताब-ए-अज़ल
    ज़बाँ पे नाम तिरा हर्फ़-ए-आख़िरी की तरह

    हम उन ख़ुदाओं से झुक कर नहीं मिला करते
    जो आदमी से न मिलते हों आदमी की तरह

    वो दर्द दुश्मन-ए-जाँ कैसे बन गया 'परवीन'
    जिसे अज़ीज़ रखा हम ने ज़िंदगी की तरह
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    Parveen Kaif
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    फ़ैसले की उस घड़ी का इल्तवा अच्छा लगा
    एक रिश्ता टूटने से बच गया अच्छा लगा

    जान-ए-मन जान-ए-वफ़ा ख़त में लिखा अच्छा लगा
    दूर से उस ने मुझे अपना कहा अच्छा लगा

    मैं ने ग़म की धुन भी छेड़ी और ख़ुशी का राग भी
    तुम बताओ गीत मेरा कौन सा अच्छा लगा

    मुझ में क्या जौहर मिरे टूटे हुए आईने को
    आज उस ने चाँद का टुकड़ा कहा अच्छा लगा

    एक दिन आई तो फिर वापस न तन्हाई गई
    मेरे उजड़े घर में उस को जाने क्या अच्छा लगा

    दिल न छोड़ेगा ज़िदें ये तो वो बालक है जिसे
    इक खिलौना मिल गया तो दूसरा अच्छा लगा

    पेश कर दीं मैं ने फ़िक्र-ओ-फ़न की तस्वीरें हज़ार
    ख़ुद पसंदों को मगर इक आईना अच्छा लगा

    चाँदनी यादों की थी 'परवीन' आँसू क्यूँ बहाए
    क्या कफ़न पे तुझ को मोती टाँकना अच्छा लगा
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    Parveen Kaif
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    चैन आता नहीं उन से मुलाक़ात किए बिन
    बोलें न वो मैं रहती नहीं बात किए बिन

    कम्बख़्त हवाओं ने ये क्या कह दिया उन से
    क्यूँ अब्र उड़े जाते हैं बरसात किए बिन

    मय आ गई घर में ये ख़बर शैख़ न सुन लें
    लौट आएँगे मस्जिद से मुनाजात किए बिन

    शायद उन्हें डर हो मैं शिकायात करूँगी
    आए थे गए पुर्सिश-ए-हालात किए बिन

    तुम उन से कोई बात इशारों में न करना
    कम-फ़हम न मानेंगे सवालात किए बिन

    सुलतान को अपना कोई शहकार न कर पेश
    छोड़ेगा न वो तुझ को क़लम हाथ किए बिन

    क्या वज़्अ' बनाते हैं सियासत के मशाइख़
    आबिद नज़र आते हैं इबादात किए बिन
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    Parveen Kaif
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    न बुलाओ मुझे ख़ुदा की तरफ़
    मैं उसी की हूँ बंदगी में लगी

    जिस में थी जंगलों की बे-नज़मी
    वो नुमाइश भी शहर ही में लगी

    रात मैं ने पढ़ी जो धूप की नज़्म
    बे-मज़ा उन को चाँदनी में लगी

    जाम-ए-सुक़रात क्या पिया मैं ने
    प्यास मुझ को न ज़िंदगी में लगी

    और कुछ काम भी करूँ 'परवीन'
    तुम तो हो सिर्फ़ शाइ'री में लगी
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    Parveen Kaif
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    धूप खिड़की से सिरहाने आई
    चाँद ख़्वाबों के बुझाने आई

    हाए वो फूल से हँसते चेहरे
    याद फिर उन की रुलाने आई

    दिल चराग़ों के अभी लर्ज़ां हैं
    फिर हवा होश उड़ाने आई

    दिल सुलगता था शब-ए-ग़म यूँही
    चाँदनी और जलाने आई

    उठ हुई सुब्ह-ए-अज़ाँ की आवाज़
    नींद से मुझ को जगाने आई

    ओढ़ ली तू ने बरहना तहज़ीब
    शर्म तुझ को न ज़माने आई

    और 'परवीन' से हुज्जत कीजे
    आप की अक़्ल ठिकाने आई
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    Parveen Kaif
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    ख़ुदा बचाए मोहब्बत की उस बला से भी
    कि दर्द-ए-दिल नहीं जाता किसी दवा से भी

    जला रखे हैं मिरी ज़िंदगी में साँसों ने
    चराग़ ऐसे कि बुझते नहीं हवा से भी

    मिरे लिए मिरा अल्लाह कौन सा कम है
    मुझे तो काम नहीं है किसी ख़ुदा से भी

    चराग़-ए-राह बनाया है तुम ने किस किस को
    कभी मिले हो मोहम्मद के नक़्श-ए-पास भी

    हम अपनी जान उसी पर निसार करते हैं
    हमें वो क़त्ल करे चाहे जिस अदास भी

    इसी चमन में जो मेरा चमन है मेरा चमन
    बहुत से पेड़ मिरे ख़ून के हैं प्यासे भी

    सितम किसी पे वो करते नहीं हमारे सिवा
    जफ़ा तो है ये मगर कम नहीं वफ़ा से भी

    धड़कते शे'र सुने हम ने बिन्त-ए-'कैफ़' से आज
    मिले हम एक मोहब्बत की शाएरा से भी
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    Parveen Kaif
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    सिकंदर के सफ़र की बात निकले
    कफ़न में से हों ख़ाली हाथ निकले

    वो कल की फेसबुक वो 'कैफ़'-ओ-'शे'री'
    वो देखो चाँद सूरज साथ निकले

    मैं निकलूँ चाँदी और सोना पहन कर
    मगर मिट्टी मिरी औक़ात निकले

    तवक़्क़ो ले के वो आया था लेकिन
    उसी जैसे मेरे हालात निकले

    जहाँ अर्थी उठाई जा रही हो
    उसी कूचे से क्यूँ बारात निकले

    सितारों का शरफ़ क्या वो तो 'परवीन'
    हमारी ज़ात के ज़र्रात निकले
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    Parveen Kaif
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    चाँद पर क्यूँ मैं अकेली जाती
    साथ कोई तो सहेली जाती

    आओ मिल-जुल के सहें हिज्र की धूप
    मुझ से तन्हा नहीं झेली जाती

    बोलना मुझ से न तुम बंद करो
    हर तरफ़ बात है फैली जाती

    हम अगर अक़्ल को दरबाँ करते
    हाथ से दिल की हवेली जाती

    हाए संदल के दरख़्तों की ये राख
    जान ख़ुशबू की न ले ली जाती

    बन तो सकता था नया इक कमरा
    अपने आँगन की चमेली जाती

    प्यास जाती न अगर साहिल पर
    क्यूँ समुंदर में अकेली जाती

    चाँद झाँके जो किचन में 'परवीन'
    मुझ से रोटी नहीं बेली जाती
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    Parveen Kaif
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    हया तो उस से शरमाती बहुत है
    पड़ोसन मेरी इतराती बहुत है

    वो घर में चैन से रहती है कम-कम
    मगर छत पर नज़र आती बहुत है

    नहीं सुनती किसी की अपने आगे
    समझती कम है समझाती बहुत है

    करे है गुफ़्तुगू सरगोशियों में
    मगर ज़ेवर तो खनकाती बहुत है

    बड़ी संजीदा बनती है वो लेकिन
    मियाँ से छुप के मस्तानी बहुत है

    मिरे अल्लाह उस की गोद भर दे
    वो तन्हा लोरियाँ गाती बहुत है
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    Parveen Kaif
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