Wajahat Husain Wajahat

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Wajahat Husain Wajahat shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Wajahat Husain Wajahat's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Nazm
इक रोज़ किसी गाय के जी में ये समाया
इंसान ने हम को तो बुरी तरह सताया
लाज़िम है कि इक जल्सा करे क़ौम हमारी
और आ के शरीक उस में हो हर अपना पराया
तज्वीज़ हों इस ज़ुल्म से बचने के तरीक़े
हर रोज़ की सख़्ती से तो दम नाक में आया
कुछ और भी गाएँ जो वहाँ पास थीं मौजूद
उस गाय ने उन सब को भी ये भेद बताया
बस हो गई फिर जलसे की तारीख़ मुक़र्रर
उन गायों ने इस में बड़ी गायों को बुलाया
जब आ के वहाँ बैठ गईं सैंकड़ों गाएँ
इक गाय को इस जलसे का सरदार बनाया
इक गाय ने फिर उठ के कहा सुनती हो बहनो
इंसान ने हम को तो बहुत नाच नचाया
अब बढ़ गए हैं ज़ुल्म-ओ-सितम हद से ज़ियादा
कर डाला है ज़ालिम ने हज़ारों का सफ़ाया
दाने का तो क्या ज़िक्र नहीं घास भी मिलती
भूके रहे फ़ाक़ों ने हमें ख़ूब घुलाया
इस तरह जो कमज़ोर हुए हम तो सितम है
ज़ालिम ने क़साई से हमें ज़ब्ह कराया
मोची के हवाले हुई फिर खाल हमारी
अफ़्सोस है उस ने भी तो जूता ही बनाया
बस इस से ज़ियादा भी न होगी कोई ज़िल्लत
अफ़्सोस है पहले से हमें ध्यान न आया
इंसान ने कुछ क़द्र न की रंज है इस का
घी हम ने खिलाया उसे और दूध पिलाया
बेहतर है कि अब छोड़ दें हम उस से तअ'ल्लुक़
जंगल में रहें शहर में कुछ चैन न पाया
घास और हरे खेत चरें अपनी ख़ुशी से
आज़ाद हों क्यों जान को ये रोग लगाया
तक़रीर हुई ख़त्म तो इक नीली सी गाय
झुँझला के उठी और उसे ग़ुस्सा बहुत आया
कहने लगी सुन ऐ मिरी पुर-जोश बहन सुन
इंसान का जो ज़ुल्म-ओ-सितम तू ने जताया
इंसाफ़ से देखो तो ये है फ़र्क़ समझ का
एहसान जो उस का है वो क्यों दिल से भुलाया
वो रात को देता है हमें वक़्त पे चारा
सर्दी हो तो करता है हमारे लिए साया
बरसात में मच्छर भी उड़ाता है धोएँ से
उस ने हमें तकलीफ़ से और दुख से बचाया
हर तरह से करता है हिफ़ाज़त वो हमारी
क्या हो गया हम ने जो उसे दूध पिलाया
जंगल में ये आराम ये राहत नहीं हरगिज़
तौबा करो तौबा ये है क्या जी में समाया
जंगल में तो हैं शेर भी चीते भी हज़ारों
खा जाएँ हमें फाड़ के कर डालें सफ़ाया
सर्दी हो तो जंगल में नहीं कोठरी कोई
बारिश हो तो छप्पर है कोई छत है न साया
इंसान हमारे लिए राहत का सबब है
बस हम ने उसे सुन लिया जो तुम ने सुनाया
अच्छी नहीं नाशुक्र-गुज़ारी की ये बातें
अफ़्सोस है जलसे में यहीं वक़्त गँवाया
इंसान ने कुछ ज़ुल्म भी हम पर किए बे-शक
लेकिन न बचा उस से कोई अपना पराया
जो अपने ही हम-जिंसों के हो ख़ून का प्यासा
क्या शिकवा अगर हम पे उसे रहम न आया
ऐ बहनो मुनासिब है कि तुम सब्र करो अब
कहते हैं ख़ुदा को भी तो ये सब्र है भाया
उस गाय की तक़रीर से चुप हो गई गाएँ
फिर सब ने कहा ठीक है जो तुम ने बताया
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Wajahat Husain Wajahat
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हाए तक़दीर कि मैं आन फँसा पिंजरे में
अब नहीं ख़ाक भी जीने का मज़ा पिंजरे में
छुट गए क़ैद में मुझ से मिरे बीवी बच्चे
कोई साथी है न ग़म-ख़्वार मिरा पिंजरे में
घर की दीवारें भी अफ़्सोस हैं ऊँची ऊँची
कभी आती नहीं जंगल की हवा पिंजरे में
ताज़े ताज़े हैं कहाँ आज वो फल बाग़ों के
मिलती है सूखी सड़ी मुझ को ग़िज़ा पिंजरे में
कोई अमरूद नहीं आम नहीं बेर नहीं
कभी केला भी न खाने को मिला पिंजरे में
हाए इस शाख़ से उस शाख़ पे उड़ कर जाना
याद आता है वो उड़ने का मज़ा पिंजरे में
तीलियों से मिरा सर फूटता है वाए नसीब
चोट लगती है जो उड़ता हूँ ज़रा पिंजरे में
अब तो सब भूल गया बैठ के टें टें करना
चुप पड़ा रहता हूँ मैं बुत सा बना पिंजरे में
कहते हैं छोटे बड़े घर के मियाँ मिठ्ठू सब
वाह ये ख़ूब लक़ब मुझ को मिला पिंजरे में
मैं समझता हूँ जो मतलब है मियाँ मिठ्ठू का
बावला जानती है ख़ल्क़-ए-ख़ुदा पिंजरे में
इसी हालत में गुज़र जाएँगे बाक़ी दिन भी
इक दिन आ जाएगी बस मेरी क़ज़ा पिंजरे में
रहम कर रहम कर अल्लाह मिरे हाल पे तू
मिल चुकी अब तो मुझे ख़ूब सज़ा पिंजरे में
तेरी क़ुदरत है बड़ी जल्द छुड़ा दे मुझ को
दम मिरा जीने से रहता है ख़फ़ा पिंजरे में
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क्या कहूँ तुम से बात जाड़े की
लम्बी होती है रात जाड़े की
नींद इक बार जब उचटती है
बड़ी मुश्किल से रात कटती है
लोग आँखों को बंद करते हैं
जागना ना-पसंद करते हैं
ख़ूब करवट पे लेते हैं करवट
नींद आए किसी तरह झट-पट
वो कभी ओढ़ना रज़ाई का
वाह क्या कहना इस सफ़ाई का
है ये मतलब कि जी न घबराए
चैन से सोएँ नींद आ जाए
मगर ऐसी घड़ी उड़ी थी नींद
सुब्ह तक फिर ज़रा न आई नींद
बन सँवर कर बहुत पड़े लेकिन
जागते जागते चढ़ आया दिन
मस्जिदों में अज़ान होने लगी
जल्वा-गर दिन की शान होने लगी
मुर्ग़ अब बोलते हैं कुकड़ूँ कूँ
और कबूतर भी करते हैं ग़ट गूँ
क्या सबब नींद क्यों उचटती है
रात क्यों मुश्किलों से कटती है
बात ये है जो हैं निकम्मे लोग
काम का पालते नहीं हैं रोग
उन को मतलब नहीं किताबों से
रात को वो सबक़ नहीं पढ़ते
शाम ही से वो लेट रहते हैं
बात सुनते हैं और न कहते हैं
लम्बी होती है रात जाड़ों की
नींद भर कर है आँख खुल जाती
जाग कर फिर वो सुब्ह करते हैं
जैसी करते हैं वैसी भरते हैं
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