"चाचा नेहरू का ख़त बच्चों के नाम"

मिरे अज़ीज़ वतन के अज़ीज़ फ़रज़ंदो
मिरे वतन की नई सुब्ह के नक़ीब हो तुम
बिछड़ के तुम से कई साल हो चुके हैं मगर
गुमान होता है अब तक मिरे क़रीब हो तुम
दिवालियाँ हों कि ईदें ख़ुशी मना लेना
कभी ये दिल में न लाना कि बद-गुमाँ हूँ मैं
तुम इस यक़ीन को दिल से निकालना न कभी
कि दूर रह के भी तुम सब के दरमियाँ हूँ मैं
मैं जानता हूँ जुदाई का दुख बहुत होगा
तुम अपने दुख को अमल से मिटा भी सकते हो
अगरचे दूर हूँ तुम से बहुत ही दूर मगर
मुझे तलाश करो तुम तो पा भी सकते
तुम्हें मिलूँगा मैं गंगा की शोख़ मौजों में
वो शोख़ मौजें जिन्हों ने मुझे क़रार दिया
तुम्हें मिलूँगा हिमाला की सब्ज़-वादी में
तमाम उम्र मुझे जिस ने माँ का प्यार दिया
तुम्हें मिलूँगा मैं खेतों की गर्म मिट्टी में
किसान अपना पसीना जहाँ बहाते हैं
तुम्हें मिलूँगा मशीनों के दरमियान जहाँ
हज़ारों हाथ नई क़िस्मतें बनाते हैं
तुम्हें मिलूँगा मैं काशी की सरहदों में कभी
कभी मिलूँगा मैं अजमेर के गुलिस्ताँ में
कभी चराग़ की मानिंद शब के सीने पर
कभी गुलाब की सूरत वतन के दामाँ में

— Zafar Gorakhpuri

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