"अगर कुछ लिखूँगा"

तेरा चेहरा गुलाब तेरी आँखें शराब
मैं पन्ना बना हूँ तू मेरी किताब

अगर कुछ लिखूँगा तो तुझ पर लिखूँगा
लिखूँगा तुम्हारे पैरों की आहट
पायल की छनछन लब की मुस्कुराहट

लिखूँगा वो केश जो हवा के साथ झूमते हैं
कानों की बाली जो गाल चूमते हैं
तुम्हें देख कर कुछ आशिक़ गली के
गली में यूँ ही सारी रात घूमते हैं

आँखों की मोती चमक मैं लिखूँगा
साँस में बसंत की लहक मैं लिखूँगा

लिखूँगा मैं सरसों के फूल के गजरे
मोगरे के नाक की नथिया लिखूँगा
मैं ख़ुद को लिखूँगा पिघलता हुआ मोम
तुम को अँधेरे का दिया लिखूँगा

बे-सबब मोहब्बत की आफ़त लिखूँगा
वफ़ा की ये उल्टी ख़िलाफ़त लिखूँगा
लिखूँगा वो न देखने का बहाना
तुम बहाना कहो मैं शिकायत लिखूँगा

तेरे दिल के भीतर कहानी लिखूँगा
वो कहानी जो बिल्कुल अधूरी न हो
मगर फिर कभी भी वो पूरी न हो

— Anurag Pandey

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