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कोर्ट में तारीख़ के ये सिलसिले चलते रहेऔर वो लड़की वहाँँ पर शर्म से ही मर गई
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भेज देता हूँ मगर पहले बता दूँ तुझ कोमुझ से मिलता नहीं कोई मिरी तस्वीर के बा'द
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ये देख शाम हो गई बता कहाँ मैं जाऊँगाजो पेड़ थे वो कट चुके वो मेरा घर नहीं रहा
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अगर मैं कथा का क़लमकार होतायक़ीनन ही वो तो मिरा यार होतालगाती नहीं हर दफ़ा वो बहानेलगा लेती सीने से गर प्यार होता
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शराफ़त ने मुझ को कहीं का न छोड़ारक़ीब अपने ख़त मुझ सेे लिखवा रहे हैं
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"बात ये है कि आदमी शाइर या तो होता है या नहीं होता" ये शेर इस बात को तो पुख़्ता करता है कि शायर बनना कोई ऐसा काम नहीं है जो किताबी ज्ञान से पढ़ कर किया जाए। मगर शायरी के लिए ये ज़रूरी...
February 24, 2024
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