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ज़बाँ रखता हूँ लेकिन चुप खड़ा हूँमैं आवाज़ों के बन में घिर गया हूँ
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मैं इसलिए भी तिरे वस्ल से झिझकता हूँकहीं फिर इश्क़ मेरा रायगाँ न हो जाए
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सारे आँसू तुझ पर ज़ाया' क्यूँँ कर देंहमनें तेरे बा'द भी दिलबर करने हैं
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आँख जो कुछ देखती है लब पे आ सकता नहींमहव-ए-हैरत हूँ कि दुनिया क्या से क्या हो जाएगी
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मज़ा आता अगर गुज़री हुई बातों का अफ़्सानाकहीं से तुम बयाँ करते कहीं से हम बयाँ करते
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"बात ये है कि आदमी शाइर या तो होता है या नहीं होता" ये शेर इस बात को तो पुख़्ता करता है कि शायर बनना कोई ऐसा काम नहीं है जो किताबी ज्ञान से पढ़ कर किया जाए। मगर शायरी के लिए ये ज़रूरी...
February 24, 2024
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