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उसे मेरे शेर-ओ-फ़न से जाने क्यूँँ इतनी वहशत हैपहले ग़ज़लें दफ़्न करेगा फिर मुझ को दफ़नाएगा
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तुझ से सौ बार मिल चुके लेकिनतुझ से मिलने की आरज़ू है वही
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बचपन में हम ही थे या था और कोईवहशत सी होने लगती है यादों से
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इक अजनबी झोंके ने जब पूछा मिरे ग़म का सबबसहरा की भीगी रेत पर मैं ने लिखा आवारगी
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ये वा'दा किया था दोबारा मिलेंगेन आया कोई ख़त न आई मोहब्बत
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Sher
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Ghazal
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Nazm
"बात ये है कि आदमी शाइर या तो होता है या नहीं होता" ये शेर इस बात को तो पुख़्ता करता है कि शायर बनना कोई ऐसा काम नहीं है जो किताबी ज्ञान से पढ़ कर किया जाए। मगर शायरी के लिए ये ज़रूरी...
February 24, 2024
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