मेरा दुश्मन भी मोतबर न हुआ
आँसुओं का मिरे असर न हुआ।
आदमी हैं मगर नहीं इन्साँ
एक जंगल है जो नगर न हुआ।
उम्र गुज़री मिली नहीं मंज़िल
ख़त्म आख़िर मेरा सफ़र न हुआ।
वो मिरे ग़म में यार हँसता है
वो भी पत्थर है राहबर न हुआ।
मुद्दतों से हँसी नहीं आई
ग़म मिरा है कि मुख़्तसर न हुआ।
ग़म भुलाए नहीं बना यारो
जाम पी कर भी बेख़बर न हुआ।
बद्दुआएँ बहुत दीं यारो ने
मुझ पे अफ़सोस कुछ असर न हुआ।
— Dharamraj deshraj















