Meaning of

अनवार

anwaar • انوار

प्रकाश; चमक

lights; radiances

روشنی; چمک

Arabic

बिगड़ गई थी जो दुनिया सॅंवार दी हम ने
चढ़ा के सर पे मुहब्बत उतार दी हम ने

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मुद्दतों बा'द इक शख़्स से मिलने के लिए
आइना देखा गया, बाल सँवारे गए

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बद-नज़र से कभी नहीं देखा
तेरी तस्वीर भी कुँवारी है

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सोचा था हम ने आज सँवारेंगे वक़्त को
अब हाथ में है ज़ुल्फ़, तो फिर ज़ुल्फ़ ही सही

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खद्दर पहन के बेच रहा था शराब वो
देखा मुझे तो हाथ में झंडा उठा लिया

मैं भी कोई गँवार सिपाही न था जनाब
मैं ने भी जाम फेंक के डंडा उठा लिया

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मुझ को ख़्वाहिश है उसी शान की दिवाली की
लक्ष्मी देश में उल्फ़त की शब-ओ-रोज़ रहे

देश को प्यार से मेहनत से सँवारें मिल कर
अहल-ए-भारत के दिलों में ये 'कँवल' सोज़ रहे

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बिगड़ गई थी जो दुनिया सॅंवार दी हम ने
चढ़ा के सर पे मुहब्बत उतार दी हम ने

अँधेरी रात किसी बे-वफ़ा की यादों में
बहुत तवील थी लेकिन गुज़ार दी हम ने

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कि देखो ख़ूब-सूरत लग रही है ना ये पहले से
हाँ इस तस्वीर की मैं ने ही कल ज़ुल्फ़ें सँवारी थी

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उसी की आस ने सँभाल रक्खा हिज्र में मुझे
वही जो अपनी ज़ुल्फ़ें तक नहीं सँवार पाती है

6

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मुझ सेे मिलने वो मेरे घर आ रही
मैं भी बैठा हूँ सँवारे बाल को

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बिगड़ गई थी जो दुनिया सॅंवार दी हम ने
चढ़ा के सर पे मुहब्बत उतार दी हम ने

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मुद्दतों बा'द इक शख़्स से मिलने के लिए
आइना देखा गया, बाल सँवारे गए

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मूल रूप से, 'अनवार' प्रकाश या चमक को दर्शाता है, जो प्रकाश की भावना को पकड़ता है। कविता में, यह ज्ञान, आशा और आत्मा के भीतर दिव्य चिंगारी का प्रतीक बन जाता है।

कवि 'अनवार' का उपयोग आध्यात्मिक जागृति, समझ की सुबह, या प्रेम की चमक की छवियों को उजागर करने के लिए करते हैं। यह अक्सर अज्ञानता पर विजय का प्रतीक बनकर अंधकार के विपरीत होता है।

कविता में 'अनवार' आशा और ज्ञान का प्रकाशस्तंभ है, जो हमें छायाओं के माध्यम से मार्गदर्शन करने वाले प्रकाश की याद दिलाता है।