Meaning of

अर्घ

argh • ارغ

अर्घ्य; भेंट

libation; offering

ارغ; نذر

Sanskrit

फ़ारिग़ नहीं लेकिन तुझे दिल ने मिरे
ख़्वाबों ख़यालों में सजा रक्खा सदा

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इस दुनिया के मरघट पथ तक
हाथ पकड़ कर हाथ चलेंगे

केवल मॉल नहीं हम दोनों
सब्ज़ी मंडी साथ चलेंगे

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तिरे ये आशिक़ों की भीड़ से है शहर में रौनक़
नहीं तो शहर की क़िस्मत में सन्नाटा है मरघट का

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ज़ख़्म क्या होगा जहाँ में और कोई दूसरा
बाप के शाने अगर मरघट को बेटा चल पड़े

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बता दी दिल की सभी बातें उस को मैं ने आज
मैं मरघटे से हूँ लौटा अज़ान देते हुए

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अब मुझे फ़ारिग़ करो तुम अपनी यादों से
कोई आया है मेरा बनने मेरे घर में

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सितारे जब तिरे सब डूब जाएँगे किसी इक दिन
अभी हैं साथ जो भी ऊब जाएँगे किसी इक दिन

नहीं तुझ पे हैं तेरी दौलत-ओ-शोहरत पे हैं माइल
तुझे सब छोड़ ये मर्ग़ूब जाएँगे किसी इक दिन

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मौत के बा'द भी ज़ात न पीछा छोड़ेगी
इन सबने मरघट भी अलग बनाए हैं

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फ़ारिग़ नहीं लेकिन तुझे दिल ने मिरे
ख़्वाबों ख़यालों में सजा रक्खा सदा

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इस दुनिया के मरघट पथ तक
हाथ पकड़ कर हाथ चलेंगे

केवल मॉल नहीं हम दोनों
सब्ज़ी मंडी साथ चलेंगे

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अपने मूल अर्थ में, 'अर्घ' एक पवित्र अर्पण का संकेत करता है, जो श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है। कविता में, यह अपने धार्मिक मूल से आगे बढ़कर आत्मसमर्पण और प्रेम का रूपक बन जाता है।

'अर्घ' का प्रयोग कवि अक्सर किसी की भक्ति की गहराई को दर्शाने के लिए करते हैं। यह किसी प्रिय या उच्च शक्ति के प्रति आत्मसमर्पण का प्रतीक हो सकता है। यह शब्द पवित्र अनुष्ठानों की छवि को उभारता है, जिससे कविता की भावनात्मक गहराई बढ़ जाती है।

कविता के क्षेत्र में, 'अर्घ' गहन भक्ति और बलिदान को व्यक्त करने का माध्यम बन जाता है। यह देने और पाने के शाश्वत नृत्य के साथ गूंजता है।