Meaning of

तल्ख़

talkh • تلخ

कड़वा; कठोर

bitter; harsh

تلخ; سخت

Persian

एक ये भी तल्ख़ सच है ज़िंदगी का मेरे दोस्त
शख़्स कोई सिर्फ़ मेरा तो कभी होता नहीं

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लहजा ही थोड़ा तल्ख़ है दुनिया के सामने
वैसे तो ठीक ठाक हूँ मैं बोल-चाल में

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कल रात बहुत ग़ौर किया है सो हम उस की
तय कर के उठे हैं कि तमन्ना ना करेंगे

इस बार वो तल्ख़ी है की रूठे भी नहीं हम
अब के वो लड़ाई है के झगड़ा ना करेंगे

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तल्ख़ियाँ इस में बहुत कुछ हैं मज़ा कुछ भी नहीं
ज़िंदगी दर्द-ए-मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं

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तुम सितारों के भरोसे पे न बैठे रहना
अपनी तदबीर से तक़दीर बनाते जाओ

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तदबीर के दस्त-ए-रंगीं से तक़दीर दरख़्शाँ होती है
क़ुदरत भी मदद फ़रमाती है जब कोशिश-ए-इंसाँ होती है

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तल्ख़ फब्तियाँ तीखी बातें उस पर तंज़ भरे अश'आर
उन के लब हरकत में आए शहद घुल गया कानों में

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कुछ इस के सँवर जाने की तदबीर नहीं है
दुनिया है तिरी ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर नहीं है

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कितनी कड़वी हैं बातें भी इस दुनिया की यारों
अब ज़िंदगी मेरी ही मुझ को तल्ख़-नवा लगती है

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तल्ख़ बातों से ही मल्बूस न रहती है ज़बाँ
मीठे अल्फ़ाज़ ज़बानों को क़बा देते हैं

मैली पोशाक लपेटे वो मलंगों से लोग
मस्त होने पे ख़ुदा तक भी बना देते हैं

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एक ये भी तल्ख़ सच है ज़िंदगी का मेरे दोस्त
शख़्स कोई सिर्फ़ मेरा तो कभी होता नहीं

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लहजा ही थोड़ा तल्ख़ है दुनिया के सामने
वैसे तो ठीक ठाक हूँ मैं बोल-चाल में

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तल्ख़ का मूल अर्थ है कड़वाहट, चाहे वह स्वाद में हो या अनुभव में। कविता में, यह अक्सर जीवन की कठोर वास्तविकताओं, अधूरी इच्छाओं के दर्द और खोए हुए प्रेम के दुख का प्रतीक होता है।

कवि अक्सर तल्ख़ का उपयोग जीवन की चुनौतियों की कड़वाहट को व्यक्त करने के लिए करते हैं। यह हृदयविदारक, निराशा और मानव अस्तित्व के साथ आने वाले अनिवार्य दुखों के बारे में कविताओं में आता है।

तल्ख़ जीवन की कड़वाहट को दर्शाता है, जो मानव भावनाओं की गहराई की याद दिलाता है।