Meaning of

शहर-ए-ख़मोशाँ

shehr-e-khamaoshaan • شہر خاموشاں

मौन का शहर; कब्रिस्तान

city of silence; graveyard

خاموشی کا شہر; قبرستان

Persian

उदासी का सबब दो चार ग़म होते तो कह देता फ़ुलाँ को भूल बैठा हूँ फ़ुलाँ की याद आती है — Ashu Mishra
फ़ुलाँ औरत किसी के इश्क़ में पागल हुई कभी तुम ने सुना क्या क्योंकि ये मुमकिन नहीं — Prit
फलाँ ने फलाँ को ये क्या कह दिया फलाँ के लिए मैं फलाँ हो गया — Shreesh Mishra
फलाँ तारीख़ को वो बातें जो की थी हम ने वही काफ़ी हैं मिरे ज़ख़्म जलाने के लिए — Faiz Ahmad
महफ़िल-ए-ख़ूबाँ ओ मय खाना नहीं तेरे लिए शहर-ए-ख़मोशाँ तेरी आख़िरी मंज़िल है शजर — Shajar Abbas
जिस फ़लाने को आज अपना समझ रहे हो तुम इक ज़माना था जब वो ही फ़लाँ हमारा था — Akash Rajpoot
फलाँ लड़की फलाँ इंसाँ या आदमी की तरह मैं ने बनना नहीं चाहा कभी किसी की तरह — Shiva awasthi
वो बस्ती न सहरा यहाँ अब दिलो-जाँ हुए हैं फ़ुलाँ अब — Umrez Ali Haider

यह वाक्यांश एक ऐसी जगह की छवि बनाता है जहाँ मौन सर्वोच्च होता है, अक्सर कब्रिस्तानों का वर्णन करने के लिए उपयोग किया जाता है। यह शांति की भावना को जगाता है जो मृत्यु की गंभीरता के साथ जुड़ी होती है, एक ऐसी जगह जहाँ आवाजें शांत होती हैं और समय स्थिर प्रतीत होता है।

'शहर-ए-ख़मोशाँ' का उपयोग कवि अक्सर कब्रिस्तानों की शांति और गंभीरता को जगाने के लिए करते हैं। यह जीवन की अंतिमता और उसके बाद की शांति के लिए एक रूपक के रूप में कार्य करता है।

कविता में, 'शहर-ए-ख़मोशाँ' जीवन की अनिवार्य मौनता की एक मार्मिक याद दिलाता है।