Meaning of

शीश

sheesh • شیش

काँच; दर्पण

glass; mirror

شیشہ; آئینہ

Persian

तुम्हारा दिल मेरे दिल के बराबर हो नहीं सकता वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता — Dagh Dehlvi
रोज़ पत्थर की हिमायत में ग़ज़ल लिखते हैं रोज़ शीशों से कोई काम निकल पड़ता है — Rahat Indori
सच बोलने के तौर-तरीक़े नहीं रहे पत्थर बहुत हैं शहर में शीशे नहीं रहे — Nawaz Deobandi
ले साँस भी आहिस्ता कि नाज़ुक है बहुत काम आफ़ाक़ की इस कारगह-ए-शीशागरी का — Meer Taqi Meer
ओढ़ लिया है मैं ने लिबादा शीशे का अब मुझ को किसी पत्थर से टकराने दो — Kumar Pashi
सोलह हज़ार रानियाँ थी श्याम आप की आशीष दीजिए कि हमें एक तो मिले — Tanoj Dadhich
ख़ुद को शीशा कर लिया है यार मैं ने अब तो तेरा देखना बनता है मुझ को — Neeraj Neer
तू अपनी शीशागरी का हुनर न कर ज़ाया' मैं आइना हूँ मुझे टूटने की आदत है — Ahmad Faraz
नश्शा-हा शादाब-ए-रंग-ओ-साज़-हा मस्त-ए-तरब शीशा-ए-मय सर्व-ए-सब्ज़-ए-जू-ए-बार-ए-नग़्मा है — Mirza Ghalib
जब से सीखा है हुनर शीशागरी का मैं ने बस उसी दिन से ये दुनिया है कि पत्थर हुई है — Saleem Siddiqui

'शीश' का मूल अर्थ काँच की नाज़ुक और पारदर्शी प्रकृति को दर्शाता है। कविता में, यह नाज़ुकता अक्सर मानव आत्मा या भावनाओं का प्रतीक बन जाती है, जो नाज़ुकता और प्रतिबिंब की भावना को पकड़ती है।

'शीश' का उपयोग कवि अक्सर नाज़ुकता और आत्मनिरीक्षण के विषयों को उजागर करने के लिए करते हैं। यह प्रेम की नाज़ुक प्रकृति या आत्म-जागरूकता की प्रतिबिंबित गुणवत्ता का प्रतिनिधित्व कर सकता है।

कविता के क्षेत्र में, 'शीश' आत्मा का दर्पण बन जाता है, जो उसकी सुंदरता और उसकी नाज़ुकता दोनों को प्रतिबिंबित करता है।