Meaning of

बहिश्त

behisht • مکیں

स्वर्ग; जन्नत; आनंद

paradise; heaven; bliss

جنت; بہشت; مسرت

Persian

हसीन लोग अगर बे-वफ़ा नहीं होते
तो सारी दुनिया क़सम से बहिश्त बन जाती

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सौ चाँद भी चमकेंगे तो क्या बात बनेगी
तुम आए तो इस रात की औक़ात बनेगी

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बाग़-ए-बहिश्त से मुझे हुक्म-ए-सफ़र दिया था क्यूँँ
कार-ए-जहाँ दराज़ है अब मिरा इंतिज़ार कर

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नमकीं गोया कबाब हैं फीके शराब के
बोसा है तुझ लबाँ का मज़े-दार चटपटा

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कल राह में चमकेंगे तेरी रौशनी बनकर
ये मशवरे माँ-बाप के बेकार नहीं हैं

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दाग होंगे चेहरों पर जिन के, लोग वो सारे
चाँद बन के चमकेंगे, रोज़ आसमानों में

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जब तलब है बहिश्त की तो फिर
दिल की इस्लाह क्यूँ नहीं करता

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इबलीस जैसे सज्दे अदा कर के रात दिन
चाहत शजर के दिल में हैं देखो बहिश्त की

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तेरे बग़ैर गवारा नहीं बहिश्त मुझे
मैं पुल सिरात पे बैठा हूँ इंतिज़ार में हूँ

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ये शहर आम सा ही शहर है बहिश्त नहीं
बस इक अज़ीज़ रहा करता था यहाँ मेरा

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हसीन लोग अगर बे-वफ़ा नहीं होते
तो सारी दुनिया क़सम से बहिश्त बन जाती

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सौ चाँद भी चमकेंगे तो क्या बात बनेगी
तुम आए तो इस रात की औक़ात बनेगी

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बहिश्त शब्द एक दिव्य स्वर्ग की छवि प्रस्तुत करता है, एक ऐसा स्थान जो परम आनंद और शांति से भरा है। कविता में, यह अक्सर अप्राप्य का प्रतीक होता है, एक ऐसा स्वप्नलोक जो आकर्षक और दूरस्थ दोनों है।

कवि अक्सर 'बहिश्त' का उपयोग एक आदर्श दुनिया की लालसा व्यक्त करने के लिए करते हैं। यह जीवन की कठोर वास्तविकताओं के विपरीत होता है, जो परम शांति और संतोष का रूपक बनता है।

काव्य जगत में, 'बहिश्त' परम आकांक्षा का प्रतीक बना रहता है। यह इच्छा और संतोष की प्रकृति पर चिंतन के लिए आमंत्रित करता है।