Meaning of

भेष

bhes • بھیش

वेश; पोशाक; रूप

disguise; attire; appearance

بھیس; لباس; صورت

Sanskrit

हर मोड़ पे दुनिया में ज़रा चलना सँभल कर
शैतान यहाँ घूमते हैं भेस बदल कर

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ये भ्रामक प्रकाश ये कल्पित दीप उत्सव
दृष्टिहीन हुए तो ये सब पाया है

मर्यादा पुरूषोत्तम तो वनवास में है
सन्यासी के भेष में रावण आया है

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बना कर फ़क़ीरों का हम भेस 'ग़ालिब'
तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं

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भेस क्या क्या न ज़माने में बनाए हम ने
एक चेहरे पे कई चेहरे लगाए हम ने

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जान रहे थे भीष्म तभी तो चिंतित थे
जिस के ख़े
में में कान्हा हो, जीतेगा

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नहीं तू नहीं शेफ इस देस में रे चिड़ैया
दरिंदे हैं इंसान के भेस में रे चिड़ैया

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सांझ का जाप है तेरे प्यार का
हम को संताप है तेरे प्यार का

आज जो कुछ भी है मेरा कुछ नहीं
ये तो अभिशाप है तेरे प्यार का

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मारना रावण को हर दम ही सरल है
जो विभीषण साथ हो लंका दहन में

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न जाने भेस में वो किस के डस ले
वो नागिन इच्छाधारी हो गई है

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ख़ुदा का राज़ वही जाने जिस को ख़ुद बताए ये
बंदों के भेस में आ के ख़ुद से पर्दा उठाए ये

इन चमकी आँखों से हरगिज़ देखा नहीं जाता
दिखा उसी को है दिलबर जिसे ख़ुद दिखलाए ये

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हर मोड़ पे दुनिया में ज़रा चलना सँभल कर
शैतान यहाँ घूमते हैं भेस बदल कर

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ये भ्रामक प्रकाश ये कल्पित दीप उत्सव
दृष्टिहीन हुए तो ये सब पाया है

मर्यादा पुरूषोत्तम तो वनवास में है
सन्यासी के भेष में रावण आया है

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मूल रूप में 'भेष' का अर्थ है वह बाहरी रूप या पोशाक जिसे कोई अपनाता है। कविता में, यह शब्द अक्सर पहचान और परिवर्तन की गहराईयों में उतरता है, यह दर्शाते हुए कि कैसे बाहरी परिवर्तन आंतरिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित या छुपा सकते हैं।

'भेष' का उपयोग कवि अक्सर छद्म और प्रकट होने के विषयों की खोज के लिए करते हैं। यह समाज में लोग जो मुखौटे पहनते हैं या नई पहचान अपनाने की परिवर्तनकारी शक्ति का प्रतीक हो सकता है।

काव्यिक क्षेत्र में, 'भेष' पहचान की तरलता और उन परतों पर विचार करने के लिए आमंत्रित करता है जिन्हें हम प्रकट या छुपाना चुनते हैं।