Meaning of

दबीर

dabir • تختنشین

वक्ता; सुबोध वक्ता

orator; eloquent speaker

خطیب; فصیح و بلیغ

Arabic

जो तक़दीर लिखा सो होवे
फिर तदबीर की पर्वा कैसी

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उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया

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तुम सितारों के भरोसे पे न बैठे रहना
अपनी तदबीर से तक़दीर बनाते जाओ

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तदबीर के दस्त-ए-रंगीं से तक़दीर दरख़्शाँ होती है
क़ुदरत भी मदद फ़रमाती है जब कोशिश-ए-इंसाँ होती है

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कुछ इस के सँवर जाने की तदबीर नहीं है
दुनिया है तिरी ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर नहीं है

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ग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरें
जो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरें

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अब छोड़ कर तन्हा मुझे मसरूफ़ है वो भी कहीं
उस के लिए भी मैं फ़क़त तदबीर था तन्हाई का

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अदू होते रहे अहबाब कैसी ये करिश्माई,
इसी तदबीर में मैं रोज़ सुब्ह-ओ-शाम रहता था।

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उसे पाने का आसरा तक नहीं
सो खोने की तदबीर है मेरे पास

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क्या है मौजूद यहाँ ऐसा कोई
कि मेरे ग़म की जो तदबीर करे

कोई रखता हो मिज़ाज-ए-यूसुफ़
जो मेरे ख़्वाबों की ता'बीर करे

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जो तक़दीर लिखा सो होवे
फिर तदबीर की पर्वा कैसी

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उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया

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अपने मूल अर्थ में, 'दबीर' एक ऐसे व्यक्ति को संदर्भित करता है जो वक्तृत्व कला में निपुण होता है, शब्दों का ऐसा जादूगर जो अपनी वाक्पटुता से श्रोताओं को प्रभावित कर सकता है। कविता में, यह शब्द एक ऐसे वक्ता की छवि प्रस्तुत करता है जिसके शब्द केवल सुने नहीं जाते, बल्कि आत्मा के साथ गूंजते हैं।

'दबीर' का उपयोग कवि अक्सर ऐसे चरित्र के लिए करते हैं जिसकी वाणी शक्तिशाली और भावपूर्ण होती है। यह शब्दों की प्रेरक शक्ति का प्रतीक हो सकता है। यह मौन या अस्पष्टता के विपरीत, वाक्पटुता की सुंदरता और प्रभाव को उजागर करता है।

कविता के क्षेत्र में, 'दबीर' शब्दों की परिवर्तनकारी शक्ति का प्रमाण है। यह हमें याद दिलाता है कि एक अकेली आवाज का कितना गहरा प्रभाव हो सकता है।