Meaning of

इक़रा

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Arabic

या तो फ़ुर्क़त में निभा अहद-ए-वफ़ा
या तो शौक़-ए-जिस्म का इक़रार कर

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ये दिन तो सर्फ़ आप के वादों में हो गए
अब दिन नया निकालिए इक़रार के लिए

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तेरा इकरार मुझे सिर्फ़ तेरा कर देता
तेरे इनकार ने ते माँग बढ़ाई मेरी

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मोहब्बत के इक़रार से शर्म कब तक
कभी सामना हो तो मजबूर कर दूँ

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ये और बात कि इक़रार कर सकें न कभी
मिरी वफ़ा का मगर उन को ए'तिबार तो है

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ऐसे इक़रार में इनकार के सौ पहलू हैं
वो तो कहिए कि लबों पे न तबस्सुम आए

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हर गाम तेरे इश्क़ का इकरार है मैं हूँ
ज़ंजीर है ज़ंजीर की झनकार है मैं हूँ

ऐ ज़ीस्त जो सब सेे बड़ी फ़नकार है तू है
और तुझ सेे बड़ा वो जो अदाकार है मैं हूँ

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इक़रार में कहाँ है इनकार की सी ख़ूबी
होता है शौक़ ग़ालिब उस की नहीं नहीं पर

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वो मेहरबाँ है तो इक़रार क्यूँँ नहीं करता
वो बद-गुमाँ है तो सौ बार आज़माए मुझे

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रक़ीबों से बहुत वो आज कल इक़रार करता है
मगर मुझ को सभी के सामने इनकार करता है

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या तो फ़ुर्क़त में निभा अहद-ए-वफ़ा
या तो शौक़-ए-जिस्म का इक़रार कर

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ये दिन तो सर्फ़ आप के वादों में हो गए
अब दिन नया निकालिए इक़रार के लिए

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इक़रा एक आह्वान है लिखित शब्द के साथ जुड़ने का, ज्ञान और बुद्धिमत्ता को अपनाने का। कविता में, यह एक खोजकर्ता की छवि को उभारता है, जो जीवन और साहित्य के पन्नों के माध्यम से खोज की यात्रा पर है।

कवि 'इक़रा' का उपयोग ज्ञान की प्यास, पढ़ने के पवित्र कार्य को उजागर करने के लिए करते हैं। इसे अक्सर मौन या अज्ञानता के विपरीत रखा जाता है, शब्दों की परिवर्तनकारी शक्ति को उजागर करते हुए।

इक़रा समझ की अनंत खोज को दर्शाता है। यह लिखित शब्द के साथ जुड़ने के गहरे प्रभाव की एक कोमल याद दिलाता है।