Meaning of

ख़ुदी

khudi • انجمن

स्वयंता; व्यक्तित्व; अहंकार

selfhood; individuality; ego

خودیت; انفرادیت; انا

Persian

बोसा जो रुख़ का देते नहीं लब का दीजिए
ये है मसल कि फूल नहीं पंखुड़ी सही

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ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है

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होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है

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नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है

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बे-ख़ुदी ले गई कहाँ हम को
देर से इंतिज़ार है अपना

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बे-ख़ुदी में ले लिया बोसा ख़ता कीजे मुआ'फ़
ये दिल-ए-बेताब की सारी ख़ता थी मैं न था

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दिन रात मय-कदे में गुज़रती थी ज़िंदगी
'अख़्तर' वो बे-ख़ुदी के ज़माने किधर गए

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बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं 'ग़ालिब'
कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है

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मोहब्बत नेक-ओ-बद को सोचने दे ग़ैर-मुमकिन है
बढ़ी जब बे-ख़ुदी फिर कौन डरता है गुनाहों से

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उम्र जो बे-ख़ुदी में गुज़री है
बस वही आगही में गुज़री है

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बोसा जो रुख़ का देते नहीं लब का दीजिए
ये है मसल कि फूल नहीं पंखुड़ी सही

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ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है

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'ख़ुदी' शब्द आत्म-जागरूकता और व्यक्तित्व की गहरी भावना को जागृत करता है। अपने सार में, यह व्यक्ति के अस्तित्व के मूल से संबंधित है, जो किसी व्यक्ति की विशिष्ट पहचान को परिभाषित करता है। कविता में, 'ख़ुदी' अक्सर अपने शाब्दिक अर्थ से परे जाकर अस्तित्व और आत्म-साक्षात्कार की दार्शनिक गहराइयों का अन्वेषण करता है।

कवि 'ख़ुदी' का उपयोग आत्म-खोज और पहचान की शाश्वत खोज के विषयों में गहराई से उतरने के लिए करते हैं। इसे अक्सर सामूहिकता के साथ विपरीत रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जो व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच तनाव को उजागर करता है।

कविता में, 'ख़ुदी' अस्तित्व की भूलभुलैया के माध्यम से आत्मा को मार्गदर्शन करने वाला एक प्रकाशस्तंभ बन जाता है, इसे अपनी सच्ची सार्थकता खोजने के लिए प्रेरित करता है।