Meaning of

शीश

sheesh • شیش

काँच; दर्पण

glass; mirror

شیشہ; آئینہ

Persian

जब से सीखा है हुनर शीशागरी का मैं ने
बस उसी दिन से ये दुनिया है कि पत्थर हुई है

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तुम्हारा दिल मेरे दिल के बराबर हो नहीं सकता
वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता

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सोलह हज़ार रानियाँ थी श्याम आप की
आशीष दीजिए कि हमें एक तो मिले

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रोज़ पत्थर की हिमायत में ग़ज़ल लिखते हैं
रोज़ शीशों से कोई काम निकल पड़ता है

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ख़ुद को शीशा कर लिया है यार मैं ने
अब तो तेरा देखना बनता है मुझ को

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सच बोलने के तौर-तरीक़े नहीं रहे
पत्थर बहुत हैं शहर में शीशे नहीं रहे

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ले साँस भी आहिस्ता कि नाज़ुक है बहुत काम
आफ़ाक़ की इस कारगह-ए-शीशागरी का

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तू अपनी शीशागरी का हुनर न कर ज़ाया'
मैं आइना हूँ मुझे टूटने की आदत है

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नश्शा-हा शादाब-ए-रंग-ओ-साज़-हा मस्त-ए-तरब
शीशा-ए-मय सर्व-ए-सब्ज़-ए-जू-ए-बार-ए-नग़्मा है

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ओढ़ लिया है मैं ने लिबादा शीशे का
अब मुझ को किसी पत्थर से टकराने दो

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जब से सीखा है हुनर शीशागरी का मैं ने
बस उसी दिन से ये दुनिया है कि पत्थर हुई है

11

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तुम्हारा दिल मेरे दिल के बराबर हो नहीं सकता
वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता

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'शीश' का मूल अर्थ काँच की नाज़ुक और पारदर्शी प्रकृति को दर्शाता है। कविता में, यह नाज़ुकता अक्सर मानव आत्मा या भावनाओं का प्रतीक बन जाती है, जो नाज़ुकता और प्रतिबिंब की भावना को पकड़ती है।

'शीश' का उपयोग कवि अक्सर नाज़ुकता और आत्मनिरीक्षण के विषयों को उजागर करने के लिए करते हैं। यह प्रेम की नाज़ुक प्रकृति या आत्म-जागरूकता की प्रतिबिंबित गुणवत्ता का प्रतिनिधित्व कर सकता है।

कविता के क्षेत्र में, 'शीश' आत्मा का दर्पण बन जाता है, जो उसकी सुंदरता और उसकी नाज़ुकता दोनों को प्रतिबिंबित करता है।