यहाँ-वहाँ से बिखर रहा हूँ ये शा'इरी है

मैं आज ऐलान कर रहा हूँ ये शा'इरी है

मैं जानता हूँ कि अगली सीढ़ी पे चाँद होगा
मैं एक सीढ़ी उतर रहा हूँ ये शा'इरी है

ख़ुदा से मिलने की आरज़ू थी वो बंदगी थी
ख़ुदा को महसूस कर रहा हूँ ये शा'इरी है

वो कह रहे हैं बुलंद लहजे में बात कीजे
मैं हार तस्लीम कर रहा हूँ ये शा'इरी है

जो उड़ रही है तुम्हारे क़दमों की दिल-लगी से
वो रेत आँखों में भर रहा हूँ ये शा'इरी है

— Rauf Raza

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