RAAHI
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Ghazal

वही लहजा वही चेहरा नया रस्ता है दोज़ख़ का

मुहब्बत और नहीं कुछ भी ये दरवाज़ा है दोज़ख़ का

अगर देखे नहीं तुम ने पिता के आँख के आँसू
यक़ीनन फिर तुम्हारे साथ तो पहरा है दोज़ख़ का

गुज़ारी ज़िंदगी तन्हा अकेले उम्र भर हम ने
कहानी सुन के लगता है जहाँ बढ़िया है दोज़ख़ का

लिखा करता यहाँ जो भी फ़क़त महबूब पर ही शे'र
सुख़न-वर हो नहीं सकता वो बस शोहरा है दोज़ख़ का

बदन जब पहले आए ज़ुल्फ़ के तो तुम समझ लेना
तुम्हारा इश्क़ और आशिक़ बना क़िस्सा है दोज़ख़ का

ग़लत को दे रहे हैं वो सज़ा हर ग़लती गिन गिन कर
यहाँ के लोग से मक़सद तो पाक़ीज़ा है दोज़ख़ का

— RAAHI

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